बढ़ते नशा की आदत- बिगड़ रहा हैं सेहत

बढ़ते नशा की आदत- बिगड़ रहा हैं सेहत


चम्पारण नीति/बेतिया (अशोक शास्त्री)
 "बढ़ते नशा की लत - युवाओं की मजबूरी " अब खासकर उम्र दराज लोगों से दो कदम आगे बढ़कर आज के युवा वर्ग नशे की आदत से है मजबूर और दिन दुनी और रात चौगुनी होते जा रहे है शिकार.



     युवाओं के अनुसार विभिन्न तरह का नशा करना उनकी " शान-शौकत" के रुप में माना जा रहा है साथ ही नशा की आदत से लाचार युवाओं को सहज तरीके से साथी/सहयोगी मिल जाते है. अब तो हर चौक-चौराहे पर यह जरूर देखने को मिल जाता है कि पान की दुकानों पर विभिन्न कम्पनियों द्वारा तैयार गुटखा, सिगरेट सहित चोरी छीपे गाँजा की पुड़िया धड़ल्ले से बिक रही है. साथ ही पेय पदार्थों के साथ कुछेक पान दुकानों पर शराब की बोतले एवं अन्य मादक पदार्थ बेचे जा रहे है और खासकर आज के अधिकांश युवा समुदाय निर्भिक व निर्लज बन धड़ल्ले से सेवन करने से बाज आते.
      जैसा कि नाम नही छापने की शर्त पर कई पान दुकानदारों ने यह भी बताया कि गुटखा, पान, सिगरेट, पेय पदार्थों के साथ-साथ गाँजा की पुड़िया सहित अन्य मादक सामग्री बेचकर प्रतिदिन पन्द्रह सौ से दो हजार रुपये की कमाई हो जाती है जिससे  परिवार की दाल-रोटी सहित बेहतर जीवन चल पा रहा है कुछ बुद्धिजीवियों और जानकारों की माने तो आज नशा सेवन सचमुच में शान शौकत के रुप में देखा जा रहा है. कुछ नशेड़ियों और गुटखा के शौकीन लोगों से जब बात किया गया .... तो सीधे उनका कहना था कि नशा करना और गुटखा खाना हमारी मजबूरी बन चुकी है. हम यह जानते है कि यह हमारे लिए हानिकारक व घातक है फिर भी हम मजबूर है. साथ ही  कुछ सभ्य,शिक्षित बुजुर्गों सहित पढ़े-लिखे युवाओं से जब बातचीत हुई तो उनका मानना है कि " नशा सेवन और गुटखा " खाने से टेन्शन कम होता है, लोगों के बीच बड़प्पन की संदेश जाता है और तो और मांसिक तनाव दूर होता है. जो भी लेकिन सरकार व शासन-प्रशासन की लाख प्रयास, प्रचार-प्रसार व पाबंदी के बावजूद भी बड़े शहरों की तरह अब गाँव-घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ-साथ खासकर युवाओं के बीच अब " नशा " बड़े पैमाने पर अपना पैर पसार चुका है. यह देखा जा रहा है कि अब नशा सेवन के लिए कोई उम्र सीमा नही रह गई है. पान,गुटखा, सिगरेट, शराब, गाँजा, चरस,सुलेशन और ह्ववाईटनर सेवन करने वालों की एक बड़ी जमात तैयार हो रही है जो भविष्य के लिए घातक होगी.
        खासकर नशे की लत से युवाओं, बड़े-बुजुर्गों और बुद्धिजीवियों को परहेज़ करने की जरूरत होगी और अपने पडो़सियों, साथियों व सहयोगियों सहित सहकर्मियों को भी नशा से परहेज़ करने की सुझाव व संदेश देना चाहिए.

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