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| (लेखक -अजय प्रताप तिवारी ) |
जिस देश में ईशा मसीह की प्रेम से आप्लावित सेवा भावना ने मानवीय सम्बन्धो को प्रगाढ़ता प्रदान की ,मुहम्मद साहब के भाई -चारे ने संघठन को मजबूती दी,बुद्ध की करुणा के आधार पर सामाजिक विषमता का उन्मूलन हुआ ,मर्यादा पुरुषोत्तम राम के त्याग की भाँवना ,अहिंसावादी गांधी ने सशक्त प्रस्तुति एवं अभिव्यकित द्वारा विश्व मानव को अहिंसा की शाक्ति से परिचित कराया।आज उस देश में बढ़ती हिसंक प्रवृतियां क्रमश अधिकाधिक उग्र होती चली जा रही है। क्यों की सामाजिक परिस्थितियां इतना विक्षोपकारी है,की उनका आघात न सहकर मनुष्य आक्रमणाकारी बन बैठा है । आज देश में भीड़ तंत्र क्यों इतनी हिंसक हो जा रही है। और ऐसे समय में में जहाँ भारत समेत समूचा विश्व एक ऐसी वैश्विक महामारी से जूझ रहा है, जो मानव सभ्यता के अब तक ज्ञात इतिहास में ऐसी विकट संकट कभी नही आया था । हालांकि ये कोई नई बात नही है भारत में ऐसी घटना घटित होती रहती है ।लेकिन जब पूरा देश कोरोना से बचने के लिए अपने घरों से बाहर नही निकलते है ,ऐसे समय में मुंबई जैसे महानगरों में
दो साधुओं और एक कार चालक की हत्या भीड़ तंत्र द्वारा पीट पीट कर हत्या कर दी जाती है । उन निहत्थे को मारते वक्क्त मानव संबेदन कहाँ थी ,और जब पुरे देश में लॉक डाउन का माहौल है तो ये भीड़ कैसे इकठा हुई ये बात कुछ पेचीदा लगती है। जब हमारे देश के डॉक्टर कोरोना जाँच करने जाते है तो उनके ऊपर भी पत्थर बाजी की जाती है ।
कितनी विचलित कर देने वाली बातें है जो आप के जान को बचाने जाते है आप उन्ही का जान लेने के लिए आतुर हो जाते है ,ऐसी घटना जरूर सोची समझी और साजिश के साथ की जाती है ।आज देश में कहीं गौरक्षा, राष्ट्रवाद, जातिवाद ,संप्रदायगत और विचारधारा के नाम पर हिंसा को गलत प्रोत्साहन देकर भीड़ इकट्ठा होती हैं।और यही भीड़ किसी को मार डालती है। ये सभी वारदात मानव सभ्यता की अमानवीयत ,कूरता की चरम पराकाष्ट नही हैं ,तो क्या है ? आज अधिकतर घटनाएं राजनीति छाव तले होने वाले भीड़तंत्र की वारदातें हिसक रक्तक्रांति का कलंक देश के माथे पर लगाने से बिलकुल भी नही चूक रहे हैं ।ये लोग सुरक्षा में तैनात पुलिस के साथ भी लगातार झड़पें करते रहते है ।हालांकि पुलिस भी कही न कही अपनी तानाशाही रवैया से बाज नही आती है इस कारण भी पुलिस और समाज में समरसता नही बन पाती है । लेकिन हाल के दिनों में तेजी से बढ़ती हिंसा किसी एक प्रांत का दर्द नही रहा है ,इसने हर भारतीय दिल को जख्मी बनाया है ।आज जिस तरह से लगातार हिंसक प्रवृतियां वेहिसाब से बढ़ रही है इन्हें रोकने के लिए प्रतीक्षा नही बल्कि प्रक्रिया आवश्यक है ।
इस पर सरकार को भी चाहिए कोई ऐसी कदम उठाए जिस से इस तरह बढ़ती हिंसक झड़प ,हत्या जैसे घटना पर रोक लगाया जा सके। आज एक पल में हिंसा भड़क जाती है ,इसके पीछे कही न कही सोशल मीडिया का भी हाथ दिखाई देता हैं। एक छोटी घटना को इतना बढ़ा चढ़ा के समाज में पेश करते है, जिस से लोगो में एक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । सोशल मीडिया ज्ञान विज्ञान का एक बड़ा क्षेत्र है और इन्ही के माध्यम से समजा को देश के विभिन्न हिसो में चल रहे घटना क्रम की जानकारी मिलती हैं। इस करण ऐसी झूठी और अफवाह वाली घटना नही फैलाने चाहिए जिस से समजा में हिंस भाँवना पनपे ।
आज इसके लिए सत्ता के करीबी और सत्ता के विपक्षी हजारो तर्क देगे ,हजारो बाते करेगे लेकिन ये दशा बिलकुल ठीक नहीं है । अहिंसा का शाशवत मूल्य वर्तमान में टीसती हुई मानवता और कराहती मानव क्रांति को ऋण दे सकती है । आज हमें अपनी मूल बातो पर जैसा शिक्षा ,बेरोजगारी , भ्रष्टाचार ,भुखमरी, महामारी विषयो पर चर्चा करना चाहिए न की संप्रदायिकता ,जातिवाद ,अलगाववाद पर ।हमारी मानव सभ्यता विश्व बंधुता की परंपरा रही है ,हम पुरे विश्व को अपना बंधु मानते है ऐसे में छोटी छोटी बातों को लेकर हिंसक होना भारतीय समाज में सही नही कहा जा सकता है।आज हमें सभी प्रकार के भेद -भाव को भुलाकर एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर कर चलना होगा,
और यही हमारे सपनो का भारत होगा ।
अजय प्रताप तिवारी "चंचल"
अध्येता इतिहास
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