बांका:जनवरी माह में सात दिनों तक चलने वाला आदिवासियों का सबसे बड़ा पर्व सोहराय जिसे बंदना भी कहा जाता है। प्रखंड भर के सभी आदिवासी गांव में धुमधाम मनाया जा रहा है। इस पर्व को आदिवासी जहां नई फसल की खुशी में मनाते हैं वही इस पर्व को भाई-बहन के रिश्तों और मेहमानों की खातिरदारी के साथ-साथ आदिवासी एकता के रूप में भी देखा जाता है। इस पर्व पर आदिवासी एकता इस रूप में सामने आती है कि प्रखंड के जितने भी आदिवासी गांव हैं सभी गांव के आदिवासी एक-एक कर हर गांव में जाकर एकत्रित होते हैं और इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं। हर गांव में शादीशुदा बहनों को बुलाया जाता है जो अपने पति के साथ गांव में पहुंचती हैं उसका गांव के तैयार खलिहान में बैठा कर उनका पैर धोया जाता है। और उन्हें घर मे बनाया हुआ पकवान खिलाकर सम्मानित किया जाता है साथ ही साथ उन्हें नए कपड़े देकर भी विदा किया जाता है। आदिवासी का यह पर्व गांव घरों की सफाई निपाई और सुंदरता को दर्शाने के साथ शुरू होती है । इसमें सभी घरों को पूरी तरह साफ किया जाता है, और मिट्टी से पुताई कर उसे सुंदर बनाया जाता है। साथ ही दीवारों पर भी फूल और पत्ते बनाकर उसे सुसज्जित किया जाता है । इस पर्व पर आदिवासी बंधु सोरेन, विष्णु लाल मरांडी, कार्तिक मुर्मू, तालो सोरेन ,बुधन मुर्मू ने बातचीत में बताया कि इस पर्व में हम लोग फसल पैदा करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गाय, भैंस, और बैलों को भी सम्मान देकर पूजा करते हैं। उसे अपने खलिहान में बांधते हैं और अच्छे-अच्छे पकवान खिलाकर अपने मेहमानों के साथ नाच गाकर इस पर्व को संपन्न करते हैं। यह पर्व हम आदिवासियों के लिए एकता के साथ-साथ भाईचारे का भी पर्व होता है।



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