तटबंध का विरोध कर रहे ग्रामीण जनता
चम्पारण नीति/बेतिया/पश्चिमी चम्पारण:-
सन् सत्तर के दशक में जिले के चर्चित सिकरहना नदी के किनारे तटबंध लगाने के लिए सरकार ने जमीन अधिग्रहण कर काम शुरु की थी ......!
सिकरहना तटबंध सत्तर के दशक में शुर भी हुईं और कुछ दिनों बाद कतिपय कारणों से स्थगित भी हो गई थी । एक लंबे समय के बाद संवेदक द्वारा अचानक साल 2023 के अंतिम दौर में तटबंध निर्माण कार्य की घोषणा और आनन-फानन में अधिग्रहित जमीनों की पैमाईश के साथ-साथ निर्माण कार्य शुरु कर दी गई। इस निर्माण कार्य के क्रम में अधिग्रहित जमीनों पर सालों से लगाये गये लाखों की संख्या में पेड़-पौधों, बाँस-बगीचों को काट कर जमीन खाली कर ली गई । छोटे-बड़े भूधारी डरे-सहमे सब कुछ देखते और सहते रहे। लेकिन अन्दर ही अन्दर इस तटबंध का विरोध की स्वर उठने लगी और प्रभावित परिवारों ने दलीय, गैरदलीय स्थानीय जन नेताओं की सहयोग से चनपटिया एवं मझौलिया प्रखंड मुख्यालय पर माह दिसम्बर में एक दिवसीय धरना देकर तटबंध का विरोध किया। लेकिन विभागीय उदासीनता वश प्रभावित परिवार की समस्या पर कोई पहल व प्रयास नही हुई।
अन्तत: प्रभावित परिवारों सहित चनपटिया व मझौलिया क्षेत्र के पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने सामूहिक प्रयास कर 31दिसम्बर 2024 बकुलहर संस्कृत विद्यालय परिसर में इकट्ठा होकर तटबंध निर्माण कार्य को तत्काल रोकने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन कर रहे हूजुम के प्रतिनिधियों ने काम करा रहे मुंशी व मजदूरों से बातचीत कर फिलहाल काम बन्द रखने का सुझाव दिया और काम बन्द भी हो गया।
आगे आपको मालूम हो कि सिकरहना नदी किनारे प्रस्तावित बाँध से हजारों एकड़ खेती योग्य जमीन अधिग्रहित हुई है वही लाखों एकड़ जमीन सिकरहना और बाँध के बीच होगा। जो जमीन भविष्य में जल-जमाव या बंजर क्षेत्र बन सकता है। साथ ही असंख्य पेड़-पौधे काटे जायेंगे और कई छोटे-बड़े गाँव, बाजार आदि तटबंध के अन्दर होगें। जो बाढ़ सहित कई समस्याओं को झेलने को विवश होगें और वे तमाम गाँव और गाँव के लोग विस्थापित होने को मजबूर होगें। जैसा कि गंडक नदी के तटबंध के अन्दर तबाही होती है।
जानकारों सहित तटवर्ती गाँव के लोगों का यह मानना है कि " सिकरहना नदी " मात्र नेपाल से आने वाली तमाम छोटे-बड़े नदियों का जलग्रहण होने की वजह से भयावह तथा विकराल बनकर उदगम से समागम तक तबाही मचाती रही है। जानकारों अनुसार बूढी़ गंडक जीवनदायिनी है लेकिन नेपाल से लाई गई पानी की वजह से यह अभिशाप मानी जाती है।
स्थानीय जनो कि माने तो सरकार द्वारा यदि इन तमाम नेपाली नदियों की पानी को नेपाल क्षेत्र में ही किसी बड़ी नदी से जोड़ने की व्यवस्था कर दिया जाय या सरकार और जल संसाधन विभाग के विशेषज्ञों द्वारा स्थानीय स्तर पर जनमतसंग्रह कराकर बड़े तटबंध के बदले सिकरहना के करीब रींग बाँध यदि बना दी जाय तो सभी प्रकार की बर्बादियों से आम जनों को काफी निजात मिल सकती है।
" कहती है नदियों की यह धारा -
मत बाँधों कोई कूल-किनारा ।।"
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