विमर्श को राष्ट्रीय दिशा देने के लिए चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव- हृदय नारायण दीक्षित*

विमर्श को राष्ट्रीय दिशा देने के लिए चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव- हृदय नारायण दीक्षित*

पटना, 26 मार्च।: विमर्श को राष्ट्रीय दिशा देने के लिए ही चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव जैसे आयोजन किए जा रहे हैं। एक खास विचार के लोगों द्वारा आधुनिकतावाद का संकीर्ण अर्थ लगाया जाता है। पश्चिम से आयातित मनोवृति से छुटकारा पाना आवश्यक है। भारतीय वांग्मय 10 हजार वर्ष से अधिक पुराना है। अतः हमें पश्चिम की ओर न देखकर अपनी जड़ांे को तलाशना आवश्यक है। उक्त बातें चर्चित स्तंभकार एवं उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित ने कही। रविवार को राजधानी पटना के स्काउट एंड गाइड परिसर में आयोजित दो दिवसीय चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के समापन सत्र में वे बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। 

उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि यूरोप के देशों में 10वीं सदी के समय जो पुनर्जागरण हुआ, उस समय अंग्रेजी का ‘नेशन’ शब्द अस्तित्व में आया। जबकि लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व वेद की ऋचाओं में हमारे ऋषियों ने राष्ट्र शब्द का वर्णन किया है। स्वाभाविक है कि यूरोप के देशों द्वारा नेशन और नेशनलिज्म का जो अर्थ लगाया जाता है, वह भारतीय वांग्मय के राष्ट्र शब्द के अर्थ से बिल्कुल भिन्न और संकीर्ण है। ऋग्वेद, अथर्ववेद और उपनिषदों से संदर्भ प्रस्तुत करते हुए श्री दीक्षित ने कहा कि जिस ब्रह्म की चर्चा हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष की। जिसे हमारे पूर्वजों ने पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया, उसी अवधारणा को कार्ल सेगन ने अपनी पुस्तक ‘दि कॉसमॉस’ में लिखा है। उन्होंने मैकडोनेल और किथ द्वारा रचित वैदिक इंडेक्स की चर्चा करते हुए भारत के राष्ट्र होने का अर्थ बताया।

समापन समारोह के विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक शिक्षण प्रमुख स्वांत रंजन ने कहा कि कोई भी भाषा या बोली केवल भाषा नहीं होती बल्कि वह अपने साथ एक संपूर्ण संस्कृति, आचरण और परंपरा लेकर चलती है। भारत जैसे बहुभाषी समाज में विभिन्न भाषाओं के साहित्य जैसे कन्नड़ साहित्य, तमिल साहित्य, मराठी साहित्य व अन्य भाषाओं के साहित्य का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए, ताकि इनका प्रसार हो और समाज के अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाया जा सके। एक खास विचार के लोगों द्वारा आधारहीन तरीके से प्रेमचंद को संकीर्ण दायरे में बांधने की कोशिश की गई लेकिन प्रो. कमल किशोर गोयनका ने विधिवत तरीके से प्रेमचंद पर शोधकर सही तथ्य प्रस्तुत किया। सही सूचना समाज तक नहीं पहुंचती है तो युवा दिग्भ्रमित होते हैं। विश्वविद्यालयों में लंबे समय तक इस तरह के कुत्सित प्रयास होते रहे। इसी में सुधार हेतु चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव जैसे आयोजन देशभर में किए जा रहे हैं। 

विशेष अतिथि कुमार दिनेश ने अपने संबोधन में कहा कि वर्षों बाद बिहार में साहित्य के संबंध में बंधनों से मुक्त होकर चर्चा हो रही है। उन्होंने कार्यक्रम स्थल में स्वनामधन्य साहित्यकारों की आदमकद तस्वीर लगाए जाने एवं कार्यक्रम के साथ-साथ पुस्तक मेला जाने के लिए आयोजकों को बधाई भी दी। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर-पूर्व क्षेत्र कार्यवाह डॉ. मोहन सिंह ने कहा कि यह प्रसन्नता की बात है कि पहली बार आयोजित इस प्रकार के साहित्य उत्सव में युवाओं की भागीदारी दिखी। समानांतर सत्रों में करीब 300 लोगों की उपस्थिति हर समय रही। अपनी प्राचीन परंपराओं पर गौरव करने के लिए यह आयोजन शुरू किया गया है। अगले वर्ष फरवरी महीने में दरभंगा शहर में इसकी दूसरी कड़ी का आयोजन और बेहतर रूप में किया जायेगा।

समापन समारोह के अवसर पर प्रसिद्ध लेखिका डॉ. इंदिरा दांगी को चंद्रगुप्त साहित्य शिखर सम्मान प्रदान किया गया। सम्मानस्वरूप उन्हें 51 हजार रुपए की राशि, स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र प्रदान किए गए। इसके अतिरिक्त तीन श्रेणियों यथा- मैट्रिक व इंटर, स्नातक तथा स्नातकोत्तर एवं शोध प्रज्ञ श्रेणी में तीन-तीन पुरस्कार यानि इस प्रकार के कुल 9 पुरस्कार निबंध लेखन के विजेताओं को प्रदान किए गए। निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं को भी स्मृति चिन्ह् एवं सम्मान राशि प्रदान की गई। इस अवसर पर समापन समारोह के अध्यक्ष काली बैठा, पटना साहिब के सांसद रविशंकर प्रसाद, पटना आईआईटी के निदेशक प्रो टी. एन. सिंह, चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के संयोजक प्रो. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, सह संयोजक मिथिलेश कुमार सिंह मंच पर उपस्थित रहे। मंच संचालन डॉ. दीप्ति कुमारी ने किया।

रिपोर्ट:केआर राव


भवदीय

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