बाल साहित्य को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्लेखन की आवश्यकता- डाॅ. विकास दवे*

बाल साहित्य को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्लेखन की आवश्यकता- डाॅ. विकास दवे*

पटना :बाल साहित्य को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्लेखन करने की आवश्यकता है। आज का बच्चा जिस माहौल में पल-बड़ रहा है उसी के अनुसार साहित्य लिखना होगा। जिसे आज का बच्चा स्वीकार कर सके। यह बात मध्य प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष और चर्चित बाल साहित्यकार डाॅ. विकास दवे ने ‘लेखक से मिलिए’ सत्र में कही। उन्होंने वत्र्तमान समय में चल रहे षड्यंत्र की चर्चा करते हुए कहा कि बाल साहित्य में नैतिक मूल्यों को आधुनिकता के नाम पर हटाने का प्रपंच किया जा रहा है। बच्चों के कल्पना से राजा-रानी और परियों की कहानी जैसे साहित्य हटाये जा रहे हैं यह बाल मन के लिए उचित नहीं। डाॅ. दवे से बातचीत वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकांत ओझा ने की। 

सुप्रसिद्ध उपन्यासकार, कथा लेखिका डाॅ. नीरजा माधव ने ‘लेखक से मिलिए’ सत्र में अपने उपन्यास ‘तेभ्यः स्वधा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत विभाजन की विभीषिका में लाखों हिन्दू मारे गए थे। भारत के उस त्रासद इतिहास को आजादी के बाद वामपंथी-वक्रपंथी इतिहासकारों द्वारा एक दूसरा ही रूप देकर प्रस्तुत किया गया। स्वतंत्रता के बाद 75 वर्षाें तक भारत के छात्रों व भावी पीढ़ियों को वही पढ़ाया भी गया जिससे तथ्य और सत्य इतिहास के सामने नहीं आ सका। उनका उपन्यास ‘तेभ्यः स्वधा’ पूरे देश के सामने विभाजन के सत्य को प्रस्तुत करता है। नारी सशक्तीकरण और नारी स्वतंत्रता के वाम विचारों को पूरी तरह से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय नारी कभी अबला नहीं रही हैं। भारत में नारी सौंदर्य के भी अपने प्रतिमान रहे हैं, यहां कभी भी ‘कैटवाक’ करती महिलाओं को नारी-सौंदर्य का प्रतीक नहीं माना गया है। डाॅ. नीरजा माधव से बातचीत वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक राकेश प्रवीर ने की।

एक अन्य ‘लेखक से मिलिए’ सत्र में चर्चित कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने कविताओं का सस्वर पाठ किया। उनकी कविता ‘फिर से जाल फेंक से मछेरे’ पर श्रोता झुमते रहें। उन्होंने अपने रचना धर्मिता एवं यायावर जीवन का विस्तार से वर्णन किया। चुटकुले और लतिफेबाजी को उन्होंने कविता की परंपरा से खारिज करने की बात भी कही। इनसे बातचित वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी ने किया। 

आज तीन समानांतर सत्र भी चले। ‘भारतीय साहित्य में सांस्कृतिक चेतना’ विषयक सत्र को संबोधित करते हुए सत्र के मुख्य वक्ता अजय अनुराग ने कहा कि संस्कृति के बिना कोई समाज नहीं बन सकता। साहित्य और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. रामवचन राय ने दक्षिण भारत की भाषाओं और हिंदी में जोड़ने वाली धारा को रेखांकित किया। कार्यक्रम के अध्यक्षता महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने कहा कि सनातन मूल्यों में वेदों से लेकर लगातार संस्कृति का पालन विभिन्न स्तरों में होता रहा है। हमारे मनीषियों ने संस्कृति के साथ विकृति ने आए, इसका सदैव ध्यान रखा। यह भाव आज के चिंतकों और लेखकों के बीच रहना चाहिए। इस सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह ने किया। 

‘भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय चिति’ विषयक सत्र को संबोधित करते हुए सत्र के मुख्य वक्ता डाॅ. विजय कुमार मिश्र ने कहा कि साहित्य सामुदायिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। अपने देश के लिए राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक भाव ही देश की राष्ट्रीयता है। जो हमारा धर्म है वही हमारे राष्ट्र की चिति है। भारतीयता का मूल आधार हमारी भारत माता हैं। जो लोग बाहर जाकर कहते हैं कि भारत का लोकतंत्र खतरे में है वह पहले राष्ट्रीय बने। सत्र के अध्यक्ष प्रो. समीर शर्मा ने कहा कि भारतीय साहित्य का अध्ययन समग्र होकर करना चाहिए ना कि बांट कर। साहित्य एकता और अखंडता की दृष्टि है। साहित्य ने राष्ट्रीयता की भावना उत्तर से दक्षिण तक पहुंचाने का काम किया है। इस सत्र का संचालन डाॅ. अमित कुमार ने किया। 

एक अन्य समानांतर सत्र की मुख्य वक्ता रत्नेश्वर एवं मुख्य अतिथि डाॅ. क्षमा कौल थी। चर्चित उपन्यासकार डाॅ. क्षमा कौल ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय साहित्य का उद्भव ही ‘स्व’ बोध के लिए हुआ है। अंग्रेजी भाषा के बल पर भारतीय भाषाओं को कुंठित कर पश्चिम के विमानों को अहमियत दी गई। भारत को पश्चिम के चश्मे से परिभाषित करने का कार्य किया गया है। संस्कृत ब्रह्मांड की भाषा है भारत के ‘स्व’ की भाषा है। हमारे पास ‘स्व’ बोध के उपकरण हमेशा से रहे हैं परंतु हम ‘स्व’ बोध से वंचित रहे हैं। हमारे ज्ञान के केंद्रों को नष्ट किया गया। हमारे सांस्कृतिक धरोहर को बर्बाद किया गया। स्त्री विमर्श जो आज का है, उसमें भारतीय स्त्री को ‘स्व’ बोध से वंचित रखा जा रहा है। भारतीय नारी की शक्ति की अवधारणा से इतर अलग पश्चिमी बोध से अभिसिंचित किया जा रहा है। कार्यक्रम का मंच संचालन डाॅ. परमात्मा मिश्र ने एवं अध्यक्षता प्रो. चमनलाल गुप्ता ने की।
रिपोर्ट:केआर राव

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