बांका: बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है। बाबा नगरिया दूर है जाना जरूर है। इत्यादि तरह-तरह के नारों के साथ पूरा कांवरिया पथ केसरिया मय होकर बाबा धाम की ओर बढ़ रहे हैं। इस बर्ष दो माह चलने वाले इस सावन में गंगा धाम से बाबा धाम तक कांवरिया पथ गेरुआ वस्त्र धारियों से फट गया है। अगर आकाश से कांवरिया पथ को देखा जाए तो संपूर्ण कांवरिया पर केसरिया रंग की खींची हुई लकीर दिखाई देती है। बाबा पर आस्था और असीम कृपा का ही नतीजा है कि कांवरिया पथ की पूरी यात्रा सभी कांवरिया नंगे पैर पूरा कर लेते हैं और हर तरह के कष्ट के बावजूद नाचते झूमते बाबा दरबार पहुंच जाते हैं। विश्व का सबसे लंबा मेला कहे जाने वाले इस मेले में विभिन्न प्रकार की कांवरिया बाबाधाम जाते हैं। सबसे ज्यादा बोलबम यानी साधारण बम की संख्या होती है। यह कांवरिया गंगाधाम से जल उठाने के बाद दो से छह दिनों में बाबा धाम पहुंचते हैं। वैसे कांवरियों को डाक बम कहा जाता है जो जल उठाने के 24 घंटे के अंदर बाबा धाम पहुंचकर जलार्पण करते हैं। यह डाकबम पैदल चलते हुए ही पानी शर्बत एंव फलाहार का सेवन करते है। इसके अलावे दांडी बम की यात्रा सबसे कष्टदायी होता है। जो गंगाधाम से बाबाधाम तक दंड देते हुए जाते हैं ।इस कांवरिया को बाबाधाम पहुंचने में एक महीने से दो महीने तक का समय लगता है। क्योकि इतनी लंबी दूरी को उन्हें हाथ के सहारे छाती के बल दंड देकर तय करना पड़ता है। कुछ बम ऐसे भी आते हैं जो सिर्फ फलाहार पर निर्भर रहते हैं। इसके अलावा कुछ बम सिर्फ फलाहार कर बाबा को जल अर्पण करते हैं। इतना ही नहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो रास्ते में बैठते नहीं हैं, बल्कि खड़ा रहकर ही अपनी यात्रा पूरी करते हैं। उसे खड़ेसरी बम भी कहा जाता है।
इस प्रकार सावन में आने वाले कांवरिया सिर्फ भगवान का नाम लेकर भारत में अनेकता में एकता को उजागर करता है।



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