पंकज सिंह की रिपोर्ट
संग्रामपुर (मुंगेर) संपूर्ण क्षेत्र में होली की परंपरा मूल रास्ते से भटक गया है । 20 वर्ष पूर्व और आज के दौर में काफी बदलाव देखा जा रहा है । पूर्व में होली में फाग गायन का बहुत महत्व था । बसंत पंचमी से ही गांव में बुजुर्गों द्वारा होली गायन का शुरुआत हो जाता था। यह सिलसिला फागुन पूर्णिमा के बाद तक चलता था । आज के युवा भौतिकतावाद के चका चोध सिमटता चला गया । आज के युवा पुरानी परंपरा को छोड़ डीजे मैं अश्लील गाना बजाकर होली का आनंद उठाते हैं जो की अच्छे संस्कार की विपरीत है ।
हालांकि आज भी एक ऐसा गांव पाया गया गढ़ी मोहन सहौडा जहां की पुरानी परंपरा आज भी कायम है । इस गांव की एक खास विशेषता यह है कि होली के दिन कई तरह के खेल कूद का आयोजन कराया जाता है एवं प्रतियोगिता जीतने वाले बच्चों को पुरस्कृत किया जाता है । इससे बच्चों में खेलकूद की भावना का विकास होता है एवं नशे से दूर रहते हैं। वही शाम ढलते ही मंदिरों सामुदायिक चौपाल इत्यादि जगहों पर ढोल,झाल के साथ बुजुर्गों का जीतन शुरू हो जाता है । फिर देर शाम तक गायन का दौर चलता है । बुजुर्ग वशिष्ठ नारायण सिंह ने बताया कि ढोलक और झाल की आवाज कानों में पहुंचती है तो बुढे अस्थियों में जान आ जाता है । लेकिन आज के होली में फुहढ गीतों का भरमार है , युवा पीढ़ी नशापन के आदी हो रहे है , जिस कारण शिष्टाचार एवं संस्कार का लोप हो रहा है । इससे इससे नई पीढ़ियों को वचना चाहिए ।

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