ऐतिहासिक देवघरा पहाड़ को नहीं मिल पाया पर्यटक स्थल का मान्यता

पंकज सिंह की रिपोर्ट
संग्रामपुर (मुंगेर) अंग प्रदेश की संस्कृति विरासत देवघरा पहाड़ अपनी अतीत के लिए सदैव याद किए जाएंगे । इस पौराणिक देवघरा मंदिर का महत्व व सुनहरे अतीत के साथ न जाने कितनी कहानी संयोगे दवा है । जो की मात्रा किंवदंतियां मात्र रह गया है । यहां पाएं जाने वाले अवशेष यह साबित करता है कि शोध की जरूरत है । इस क्षेत्र को इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान दिला सकता है । इस पौराणिक पहाड़ पर स्थित शिव मंदिर जिस की आदिकाल से देवाधिदेव उच्चेश्ररनाथ महादेव के नाम से जाने जाते हैं । इस ऐतिहासिक स्थलों की अपेक्षित रहने से समुचित विकास संभव नहीं हो पाया है । यह मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूरी पर स्थित है एवं सुल्तानगंज उत्तर वाहिनी गंगा घाट से 45 किलोमीटर दूरी पर विराजमान है ।
          महाभारत एवं श्रीमद् भागवत में चर्चा ऊंचे उच्चेश्ररनाथ महादेव सिद्ध पीठ देवघरा का जिक्र है । अज्ञातवास के दौरान देवाधिदेव महादेव के कठिन तपस्या की थी  उन्होंने कठिन तपस्या की बल पर महादेव को खुश कर उन्होंने परशुपाश के रूप में गांडीव प्राप्त किया था । श्री गोविंद जी महाराज ने शोधोपरान्त बताया कि जब से देवाधिदेव महादेव ने अर्जुन को सबसे उच्च श्रेणी का गांडीव दिया , उसी दिन से देवघरा महादेव का नाम उच्चेश्ररनाथ महादेव के नाम से जाना जाता है । उसी काल से श्रद्धालुओं में उच्चेश्रनाथ महादेव के नाम से पुकारना प्रारंभ कर दिया । उच्चेश्ररनाथ पहाड़ स्थित आकाशगंगा तट पर एक विशाल सामी नाम का वृक्ष था , जिस वृक्ष पर अर्जुन ने गाडीव धनुष रखकर अज्ञातवास के लिए राजा विराट के यहां गए थे । आज भी देश के कोने-कोने से एवं पड़ोसी देश नेपाल से श्रद्धालुजन शिवगंगा में स्नान कर व उसकी मिट्टी ललाट पर लगाकर अपने आप को धन्य मांगते हैं । जहां गौतम , कणाद , कपिल , श्रतदेव  याची , विद्यापति एवं विदेहराज जनक आदि ऐतिहासिक महर्षियों ने अपनी कठिन तपस्या कर देवाधिदेव उच्चेश्ररनाथ महादेव का वरदान प्राप्त किया था । वही देवघरा मैं शिवरात्रि के शुभ अवसर पर मेला लगता है  । जिसे देखने व पूजा अर्चना करने दूर-दूर से श्रद्धालुओं का आना रहता है । यह मेला कई दिनों तक लगातार चलते रहता है वही बच्चों की मनोरंजन के लिए कई तरह के प्रबंध रहते हैं , जिससे बच्चे हर वर्ष अपने माता-पिता से जिद कर मेला देखने पहुंचते हैं । अंग प्रदेश का उच्चेश्ररनाथ महादेव सिद्धपीठ अभी उपेक्षा का दंश झेल रहा है


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