संघ लोक सेवा आयोग और हिंदी (आलेख)

 यूपीएससी परीक्षा भारत की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक है। स्वाभाविक है कि आयोग परीक्षा के लिए कई तरह की तैयारियाँ करती हो, लेकिन हिंदी के प्रति ओच्छी नजरिये से बार - बार परिणाम के पीछे हिंदी छात्रों की भविष्य लटकी मिलती है। आज आयोग यूपीएससी परीक्षा के सवालों में ऐसे शब्दों का चयन करते हैं जो खुद हिंदी माध्यम के छात्रों के भी समझ से परे है। जैसे - सर्जिकल स्ट्राइक के स्थान पर शल्यक प्रहार, डिजिटलीकरण के स्थान पर अंगीकृत आदि। खैर, ये तो कुछ नहीं यूपीएससी के अनुवादक द्वारा अंग्रेजी के एक ही शब्द के बदले हिंदी के कई शब्दों का प्रयोग अलग - अलग शब्दों में अलग - अलग स्थान पर किया जाता है। अभ्यार्थी को प्रतिवर्ष आयोग के ऐसे ही अजीबो - गरीब तीर को झेलना पड़ता है, जिससे ना केवल हिंदी भाषी बल्कि गैर - हिंदी भाषी भी चारों - खाने - चित हो जाते हैं। वर्ष 2011 से पूर्व हिंदी भाषा से सिविल सेवा के प्रारंभिक परीक्षा में सफल अभ्यार्थी 40 प्रतिशत से भी अधिक थे, वहीं अब मुश्किल से 3 - 4% ही हैं। अर्थात अंग्रेजी भाषा से सफल होने वाले बच्चों की प्रतिशत लगभग 97% के आस - पास है।

   इससे आयोग की हिंदी के प्रति उदासीनता स्पष्ट दिखती है। हमें ज्ञात हो कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के अभ्यार्थी अंग्रेजी सीख नहीं पाते हैं। जिसके कई कारण हैं। खैर , इससे विपरीत मातृभाषा हिंदी के उत्थान के लिए केंद्र सरकार के द्वारा नई शिक्षा नीति लाई गई है। जिसमें हिंदी भाषा को पांचवीं तक अनिवार्य विषय के रूप में रखने का प्रावधान किया गया है। जिससे निःसंदेह हिंदी भाषा का दायरा बढ़ेगा, लेकिन अंग्रेजी विशेष का सिविल सेवा में आधिपत्य नई शिक्षा नीति को निष्प्रभावी साबित करती है। अब देखना शेष होगा कि इस वर्ष के हिंदी माध्यम यूपीएससी परिणाम से शिक्षा आयोग किस तरह से निपटती है। और व्यवस्था सुधार के लिए क्या आवश्यक कदम उठाती है।

- मनकेश्वर महाराज ' भट्ट ' ...✍️

(लेखक चंपारण नीति के उपसम्पादक हैं।)

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