बिहार को हैं श्री बाबू वाले दृढ़ निश्चय की जरुरत।

बिहार को हैं श्री बाबू वाले दृढ़ निश्चय की जरुरत।


                             (लेखक - अमित कुमार )

समाज के सभी वर्गों के नेता थे श्री बाबूबिहार के मजबूती का नाम बिहार केशरी श्री कृष्ण बाबू।देश के महान स्वतंत्रता सेनानी,आधुनिक बिहार के निर्माता, एकीकृत बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री, बिहार केसरी श्रीबाबू को सह्रदय श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ, समाजिक और राजनैतिक जीवन में उनके योगदान और त्याग अविस्मरणीय हैं, वो सदैव हमारे प्रेरणाश्रोत बने रहेंगे।श्री बाबू अविभाजित बिहार के निर्माता के रूप में प्रांत को पहचान दिलाने की शानदार पहल की थी। एक ईमानदार राजनेता और कर्मठ प्रशासक के रूप में श्री बाबू राजनीति में सक्रिय लोगों के लिए आज भी प्रेरणा के श्रोत हो सकते हैं।आजादी के आंदोलन में जहां सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में अपनी महती भूमिका निभाई,वहीं स्वतंत्रता के पश्चात एक कुशल प्रशासक और भविष्य दृश्यता दृष्टा के रूप में बिहार के नवनिर्माण की नींव रखी,श्री बाबू देशभक्ति कर्मठता कार्यकुशलता त्याग और मानव प्रेम के अपने आप में मिसाल थे श्री बाबू जहां एक तरफ आधुनिक बिहार के प्रणेता थे वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय और समाज सुधार के पुरोधा थे।आप एक उदाहरण के तौर पर देखे की एक वक्त

अपनी बीमार पत्नी को गंगा जल देते हुए श्री बाबू ने कहा था,"..यह रख लीजिये हमारे सामने देश है,उसके बाद आप हैं."इसके कुछ ही दिनों बाद उनकी पत्नी पीएमसीएच में चल बसीं.तब श्री बाबू बतौर स्वाधीनता सेनानी जेल में थे.एक राजनेता जिनके लिए बिहार ही अपना परिवार था,उन्होंने अपने परिवार को सियासत में आगे बढ़ने के बजाय कर्मठ कार्यकर्ता को लोगों के बीच सेवा का मौका देते थे।जिन्होंने गांव को लेकर एक सपना देखा था,शिक्षा को लेकर नेतरहाट जैसे स्कूल लेकर आए ताकि गरीब। के बच्चे भी राज्य का नाम रोशन कर पाए।श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले मुख्यमंत्री थे और 1937 में पहली बार कांग्रेस के मंत्रालय से 1961 में उनकी मृत्यु तक सत्ता में थे। बिहार देश के पहले पांच साल की योजना में उनके तहत अच्छा प्रदर्शन करने वाला शीर्ष राज्य बन गया।

बिहार विभूति ए.एन. सिन्हा ने अपने निबंध ‘मेरे श्री बाबू’ में लिखा है कि, "1921 से बिहार का इतिहास श्री बाबू के जीवन का इतिहास रहा है’।

श्री कृष्ण सिंह का बिहार के सांस्कृतिक और सामाजिक विकास में बहुत बड़ा योगदान था। उन्होंने ही बिहारी छात्रों के लिए कलकत्ता में राजेंद्र छात्र निवास, पटना में अनुग्रह नारायण सामाजिक अध्ययन संस्थान, पटना में रवींद्र भवन, राजगीर वेणु वन विहार में भगवान बुद्ध की प्रतिमा और मुजफ्फरपुर के एक अनाथालय की स्थापना की थी।भारत के बारे में उनके विचार को संविधान सभा में उनकी बहस से सारांशित किया जा सकता है कि संविधान सभा में बहस करते हुए उन्होंने कहा था ‘कि भविष्य का भारत एक स्वतंत्र भारत बनने जा रहा है। उस स्वतंत्र भारत में सत्ता का स्रोत इस भूमि में रहने वाले लोगों के पास होना चाहिए।यही वह सिद्धांत है जिसके लिए हम हमेशा से लड़ते रहे हैं।प्रत्येक भारतीय वैध रूप से यह चाहता है कि एक दिन भारत पूरे एशिया में नेतृत्व करेगा और हम अब एक ऐसे राज्य का सफलतापूर्वक निर्माण करके यह नेतृत्व कर सकते हैं जो एक लोकतांत्रिक गणराज्य होगा,और साथ ही विकेंद्रीकृत होगा ताकि विभिन्न सांस्कृतिक समूहों,विभिन्न धर्म और भाषा के लोगों को एक विशाल गणराज्य में एकीकृत किया जा सकता है’।उन्होंने वर्ष 1937 से 1961 तक लगभग 24 वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में सफलतापूर्वक मार्गदर्शन किया और आधुनिक बिहार के पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें बिहार में फॉरवर्ड राज का निर्माता कहा जा सकता है ।

नव बिहार के निर्माता के रूप में बिहार केसरी डा. श्रीकृष्ण सिंह का उदात्त व्यक्तिगत, उनकी अप्रतिम कर्मठता एवं उनका अनुकरणीय त्याग़ बलिदान हमारे लिए एक अमूल्य धारोहर के समान है जो हमे सदा-सर्वदा राष्ट्रप्रेम एवं जन-सेवा के लिए अनुप्रेरित करता रहेगा। आज का विकासोन्मुख बिहार डा. श्रीकृष्ण सिंह जैसे महान शिल्पी की ही देन है जिन्होंने अपने कर्मठ एवं कुशल करो द्वारा राज्य की बहुमुखी विकास योजनाओं की आधारशिला रखी थी।अपने जीवन के अंतिम क्षण में बिहार केसरी ने अपने एक साधारण कार्यकर्ता और अपने एक नौकर के लिए दो लिफाफे में राशि छोड़कर पत्र रखकर उसे सहयोग की अपील करके राजनीति में शुचिता का भी परिचय दिया। बिहार केसरी ने जीवन से अंतिम विदाई लेने के पहले अपनी वसीयत के तौर पर तीन लिफ़ाफ़े छोड़े थे जिसमें से एक आदरणीय महेश प्रसाद सिंह जी की सबसे छोटी पुत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री उषा सिन्हा जी के नाम था,जो उनके स्नेह का प्रतीक था।

31 जनवरी,1961 को उनका निधन हो गया। उनके सम्मान में 1978 में संस्कृति मंत्रालय ने श्रीकृष्ण विज्ञान केंद्र नामक एक विज्ञान संग्रहालय शुरू किया। पटना में सबसे बड़ा सम्मेलन हॉल, श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल भी उनके नाम पर है ।उनके शासनकाल में संसद के द्वारा नियुक्त फोर्ड फाउंडेशन के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री श्री एपेल्लवी ने अपनी रिपोर्ट में बिहार को देश का सबसे बेहतर शासित राज्य माना था और बिहार को देश की दूसरी सबसे बेहतर अर्थव्यवस्था बताया था।वो सामाजिक न्याय के सच्चे पैरोकार, बेहतरीन रचनात्मक सोच और अद्भुत प्रशासनिक क्षमता के धनी थे।श्री बाबू के व्यक्तित्व से नई पीढ़ी को परिचय कराने की जरूरत है ताकि जातिवाद के दल दल में फसे बिहार को को एक नई ऊर्जा मिल सके।आज भी समाज में एक उच्च आदर्श की जरूरत है जिसे श्री बाबू  खाई को भर सकते हैं

सादगी से भरा था श्री कृष्ण सिंह का जीवन,अंतिम क्षण तक की आमलोगों की चिंता वे कर्मठ थे।उनके बताए रास्ते पर आज के नेता चले तो बिहार की दशा व दिशा बदल जाएगी। वे अपने जीवन में गरीबों के लिए उत्थान का काम करते रहे।दलितों के प्रति उनके प्रेम का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण देवघर के मंदिर में खुद जाकर दलितों के साथ पूजा करना है।सर्वप्रथम देश में जमींदारी उन्मूलन का काम श्री बाबु ने किया।विकास के प्रति प्रतिबद्धता का नजीर एचईसी हटिया, सिंदरी, बोकारो इस्पात संयंत्र, पतरातू थर्मल पावर,बरौनी (रिफाइनरी, फर्टिलाइजर,और थर्मल पावर),डालमिया नगर उद्योग समूह,अशोक पेपर मिल, दर्जनों चीनी कारखाने हैं। उनकी ईमानदारी संदेह से परे थी ।गाँव के पुश्तैनी घर का खपरैल नही उतरा, आजीवन मुख्यमंत्री रहे व्यक्ति का पटना में घर नहीं बना।कोई बैंक बैलेंस नहीं, मरने पर तिजोरी राज्यपाल की उपस्थिति में खोला गया तो 24500 रुपये वसीयत के साथ निकले जिसमे परिवार के लिए एक रुपया नहीं।ऐसे विदेह जनक के समान अनासक्त कर्मयोगी थे बिहार केसरी।ऊपर वर्णित कुछ उदाहरण ही काफी हैं यह बताने के लिए कि श्री बाबु का व्यक्तित्व किसी भी नेता से कम नहीं बल्कि विराट था।पिछले कुछ वर्षों से श्री बाबू को भारत रत्न देने की माँग तेज हुई है वर्तमान में इसपर अध्ययन कर श्री बाबू को भारत रत्न सम्मानित करना चाहिए।आज श्री बाबू के विचार को सरकार और युवा पीढ़ी में समाहित करने की आवश्यकता हैं।

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