(आदित्य दुबे /चम्पारण नीति )
भोपाल | हिंदी भवन में चल रहे साहित्य संगम एवं 27 वीं पावस व्याख्यानमाला के दूसरे दिवस दो प्रमुख विषयों पर चर्चा संपन्न हुई। पहला सत्र भारतीय भाषाओं के मध्य अंतर्संवाद तथा दूसरा सत्र 'उपभोक्तावादी विश्व में हिंदी का भविष्य' पर विद्वानों ने अपना मत रखा।
प्रथम सत्र में डॉ. उषा रानी राव ने भारतीय संतों के द्वारा हिंदी के व्यापक विस्तार पर अपनी बात रखी। आगे कहा कि हिंदी का दक्षिण भारत में विरोध करने वाले कुछ राजनीतिक लोग ही हैं। अपने स्वार्थ के लिए इस को तूल देने की कोशिश करते हैं ।
वहीं डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने भारतीय भाषाओं में एक दूसरे के संबंध को प्रकट करते हुए हिंदी की विशेषता को बताया । साथ ही संस्कृत के संवाद पर अपना विचार रखा। वहीं डॉ. मीनाक्षी जोशी ने अपने संबोधन में कहा कि बाढ़ की संभावनाओं के बावजूद नदियों के किनारे घर बने हैं ।यदि भारतीय भाषाएं अपने क्षेत्रीय बर्चस्व बनाने की अपेक्षा केंद्रीय एकता पर कार्य करती तो आज अपनी सीमा रेखा से आगे कार्य कर रही होती। इस प्रकार होने हिंदी के उत्थान को लेकर वक्ताओं के बीच अपना विचार रखा। प्रथम सत्र कि अध्यक्ष डॉ रंजना अरगड़े ने कहा कि पहले जो प्रेम भाषाओं में था । वह अब भी हो तो भाषाओं की दशा बहुत अच्छी होगी। वहीं सत्र का संचालन डॉ. मैथिली साठे ने किया।
इस अवसर पर देश के अन्य क्षेत्रों से आमंत्रित साहित्यकार व वक्ता उपस्थित रहे। जबकि दूसरे सत्र में डॉ. शरद द्विवेदी, डॉ. दर्शन पाण्डेय, शंकर सरण व मुकेश वर्मा ने 'उपभोक्तावादी विश्व में हिंदी का भविष्य' विषय पर अपने विचार प्रकट किए। सत्राअध्यक्ष के तौर पर डॉक्टर संतोष चौबे उपस्थित रहे। वहीं संचालन डॉ. सुरेंद्र बिहारी गोस्वामी ने किया। इस अवसर पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से साहित्यकार व पत्रकार मौजूद रहे।
वहीं दूसरे सत्र में वरिष्ठ पत्रकार एवं अनुवादक शरद द्विवेदी में अनुवाद और तकनीक के क्षेत्र में हिंदी की भूमिका पर निराशा ज़ाहिर की। वे कहते हैं कि हमें भाषा विशेषज्ञों के साथ बैठकर हिंदी को तकनीकी भाषा बनाने पर विचार करना होगा। हिंदी सिर्फ नारा लगाने से आगे नहीं बढ़ेगी। बाजारवाद में डूबकर ही हिंदी को आगे बढ़ाना आज की आवश्यकता है।
वहीं सत्र की अध्यक्षता कर रहे संतोष चौबे ने कहा कि अगर वैश्विक दृष्टि से हिंदी को देखा जाए, तो हम इसे एक बढ़ती हुई भाषा पाएंगे। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर कहीं न कहीं संघर्ष हमें दिखाई देता है। वहीं संचालन डॉ. सुरेंद्र बिहारी गोस्वामी ने किया। इस अवसर पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से साहित्यकार व पत्रकार तथा अतिथि विद्वान मुकेश वर्मा, दर्शन पांडे, शंकर शरण उपस्थित रहे।


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