लेखक : रामचंद्र ओझा
एक नए लेखक से यह उम्मीद करना कठिन होता है कि उसकी पहली रचना कथ्य, शिल्प और भाषा की कसौटी पर खरी हो। लेकिन फिर भी कुछ लेखक होते हैं, जिन्हें पढ़ते हुए नहीं लगता कि लेखन की दुनिया में वे नए हैं। इन्हीं में से एक हैं रामचंद्र ओझा। इनका पहला उपन्यास है ‘‘विषहरिया’’। उपन्यास हमें बेतिया के उस कालखंड में लेकर जाता है, जहां स्मृतियों के माध्यम से पहुंचने पर हमें हिंसा, अपहरण और एनकाउंटर की यादें आती हैं, लेकिन उसी कालखंड पर बुने गए इस उपन्यास के माध्यम से जब हम अतीत में जाते हैं, तो हमें मिलता है – प्रेम, रिश्तों की गर्माहट, मानवीय संवेदना और यथार्थ का एक अलग टुकड़ा।
उपन्यास के प्राक्कथन में उपन्यासकार कहते हैं, ‘‘मेरी इस कलाकृति का उद्देश्य कोई सूचना देना, या यथार्थ से परिचय कराना नहीं है और न इसके माध्यम से दुनिया बदलना ही मेरी चाहत है। .......... उपन्यास में यदि तथ्य और तर्क मिलते हैं, तो केवल श्रोता (पाठक) के संवेदन बोध और उनके भावेद्वेलन के लिए हैं।’’ भले ही लेखक की यह स्वीकारोक्ति हो, लेकिन उपन्यास को दस्यु उन्मूलन के लिए बिहार के बेतिया में चलाए गए ‘‘ब्लैक पैंथर’’ अभियान की पृष्ठभूमि में रचा गया है, ऐसे में यह उपन्यास उस दौर को जानने और समझने का एक जरिया बन जाता है।
लेखक ने कहानी की शुरुआत कुछ इस तरह से की है, जैसे पाठक को किनारे से अहिस्ता-अहिस्ता दरिया में उतारने के बजाय सीधे बीच दरिया में पटक दिया हो। क्लाइमेक्स के साथ शुरुआत। शुरुआत में ही पाठक अपने को ऐसी जगह पाएगा, जहां से निकलने के लिए उसे पूरे उपन्यास का रास्ता तय करना पड़ेगा। पहला अध्याय उपन्यास के शीर्षक वाला अध्याय है - ‘विषहरिया रे! डाक पड़ल बा हो’। जब बढ़ी हुई धड़कनों के साथ उपन्यास को पढ़ना शुरू करते हैं, तो अध्याय दर अध्याय मनुष्य और समाज की संवेदनाओं से हम रूबरू होते जाते हैं।
पश्चिम चंपारण का जिला मुख्यालय बेतिया की भौगोलिक स्थिति बिहार के अन्य जिलों से अलग है। नेपाल की तराई में बसे इस क्षेत्र का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। महात्मा गांधी ने 1917 में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत चंपारण से ही की थी। नेपाल, उत्तरप्रदेश और बिहार की सांस्कृतिक विविधताओं को संजोए बेतिया में धान एवं गन्ने की खेती और चीनी मिलें यहां के रोजगार के मुख्य साधन रहे हैं। लेकिन जब अपहरण ने यहां एक उद्योग का रूप धारण कर लिया, तो सबकुछ बदल गया।
उपन्यास में 1985 के बाद दस्यु उन्मूलन यानी ऑपरेशन ‘‘ब्लैक पैंथर’’ के बहाने सामाजिक ताने-बाने को पहचानने की कोशिश की गई है। उपन्यास का नायक ‘देव’ इस ऑपरेशन का मुखिया है। देव का बचपन, देव की पढ़ाई, देव का पुलिसिया प्रशिक्षण और देव द्वारा ऑपरेशन की अगुवाई के माध्यम से उपन्यास का एक छोर हमें 70 के दशक में ले जाता है, जब नक्सबाड़ी आंदोलन का प्रभाव युवाओं पर था और दूसरा छोर 80 के उत्तरार्द्ध तक फैला हुआ है, जब बिहार की राजनीतिक एवं सामाजिक ताने-बाने में बदलाव की बयार चल रही होती है।
उपन्यास का जो सबसे मजबूत पक्ष है, वह यह है कि ऐतिहासिक यथार्थ के बावजूद यह इतिहास को पढ़ने का अहसास नहीं कराता, बल्कि अपने कथ्य एवं शिल्प के सहारे कल्पना की दुनिया में ले जाता है, जहां कल्पना एवं यथार्थ एक-दूसरे में एकाकार हो जाते हैं। यही वजह है कि इसे पढ़ते हुए दृश्यों को गढ़ना भी आसान हो जाता है। जैसे - डीआईजी का रामनगर होते हुए गनौली पहुंचने का मसला हो या मैना का पहली बार डाकबंगले की सीढ़ियां चढ़ना या अनमोल का मारा जाना या फिर गया के साथ पुलिसिया पूछताछ।
उपन्यास में लोक बोली एवं मुहावरों का प्रयोग भी ज्यादा है। लेकिन इनका प्रयोग अकारण नहीं है। उपन्यास का प्लॉट जिस अंचल का है, उस अंचल को वहां की स्थानीय बोली के बिना प्रस्तुत करना संभव नहीं है। हिन्दी के पुरोधा कथाकारों ने भी आंचलिक उपन्यासों में स्थानीय बोली का भरपूर प्रयोग किया है। मुहावरे को लेखक ने न केवल अध्यायों को शीर्षक देने में उपयोग किया है, बल्कि संदर्भों को व्यक्त करने के लिए भी किया है। इसके लिए कुछ लोक कथाओं को भी लेखक ने अपनाया है, जैसे - मझौआ, जहां भात न पूछे कौआ, हरि अनंत हरि कथा अनंता, सूप हंसे तो हंसे चलनी भी हंसे, सिथिर सुधाय भरा थाक, चोर छूटे तो छूटे दरोगा न छूटे और दे पनिल्ला, धोउं ठोरिल्ला, खाउं गुदी का बच्चा आदि। इन खुबियों को देखा जाए, तो उपन्यास का फलक और विस्तृत हो जाता है।
उपन्यास में एक तरफ अपहरण करने वाले डाकू हैं, तो दूसरी ओर पुलिस महकमा और उपन्यास का नायक देव। देव के बहाने बहुत ही बेबाकी से पुलिसिया तौर-तरीके और विभागीय विसंगतियों को चित्रित किया गया है। एनकाउंटर का वर्णन जिस तरह से उपन्यास में किया गया है, वह हमें पुलिसिया कार्रवाई के विभिन्न पहलूओं पर सोचने को मजबूर कर देता है। यदि मैना को कहानी की नायिका माना जाए, तो मैना के बहाने स्त्री-पुरुष संबंध, समाज में एकल स्त्री की स्थिति, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष और समझौते की बीच झूलती स्त्री की तस्वीर को लेखक ने बेहतरीन तरीके से उकेरा है।
निश्चित ही भाषा, कथ्य और शिल्प की बदौलत ‘‘विषहरिया’’ को समकालान रचनाओं में एक बेहतरीन रचना की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
उपन्यास : विषहरिया
लेखक : रामचंद्र ओझा
प्रकाषक : कुटज पब्लिकेशन, 24-सी, प्रथम तल, युसूफ सराय, नई दिल्ली - 110016
मूल्य : 250 रुपए
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