" कभी वरदान थी सिकरहना अब बन गई अभिशाप "

" कभी वरदान थी सिकरहना अब बन गई अभिशाप "



 अशोक शास्त्री / बेतिया (प.च.) बिहार के प.चम्पारण स्थित बगहा और रामनगर के बीच चौतरवा चौर से निकली सिकरहना (बुढ़ी गंडक) नदी अपने तटवर्ती गाँव/ 
किसानों के लिए कभी वरदान साबित हुआ करती थी जो अब गाँव व किसानों के लिए बिल्कुल अभिशाप साबित हो रही है।
            सिकरहना की लंबाई करीब 320 कि. मी. है और यह प. चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर  जिले से गुजरती हुई खगड़िया के पास "गंगा" नदी में समाहित हो जाती है। इस क्रम में कई छोटी-बड़ी (मसान,पंडई,बालोर,हरबोरा, करताहा,सिकटा,तिलावे,ओरिया बागमती जैसी दर्जनाधिक नेपाली ) नदियों को अपने में समाहित करते हुए अपने विकराल व रौद्र रूप के कारण प्रतिवर्ष उतर बिहार में भारी तबाही मचाती रही है। जिसके चलते उतर बिहार की अधिकांश आबादी साल दर साल बेरोजगारी, भूखमरी, पलायन की मार झेलने को विवश है।
          जानकारों के मुताबिक कभी यह सिकरहना नदी अपने किनारे बसे गाँवों, किसानों, मछुआरों के लिए जीवनदायिनी साबित हुआ करती थी जो अब शायद विनाशकारी सिद्ध हो चुकी है। नेपाली नदियों के द्वारा लाई गई गाद से सिकरहना नदी का तल भर चुका है जिसके कारण एक-दो दिन की बारीश में उफान आ जाती है और किसानों की ( धान,मक्का और गन्ना) की फसल बर्बाद कर देती है।
              सिकरहना के किनारे बसे लोगों की माने तो पहले इस नदी से सिंचाई, जानवरों को नहलाने, मछली मारने और तो और पीने के लिए सालों भर इसकी पानी का उपयोग हुआ करता था लेकिन अब तो ...... जिले की चीनी मीलो सहित प्रकृति की मार झेल रही सिकरहना नदी आस-पास के गाँवों के लिए अब तबाही व बर्बादी का आलम बन चुकी है।
           जिले के चीनी मील मालिकों की मनमानी और प्रशासन की उदासीनता की वजह से सिकरहना नदी अब तो किसानों के लिए अभिशाप बन चुकी है। दर्जनों गाँवो के किसानों की माने तो नेपाली नदियों से प्रति वर्ष बिना बारिश अचानक बेसुमार पानी आने से तबाही मच जाती है। तो दूसरी तबाही चीनी मील से निकलने वाली जहर युक्त झोआ की पानी  सिकरहना की पानी को जहर बना देती है और बाढ़ के पानी साथ खेतों मे फैलने के कारण फसल बर्बाद हो जाती है। साथ ही नदी के तमाम जलीय जीव सहित मछलियाँँ भी मर जाती है और चारो ओर बदबू सडांध की स्थिति से किनारे बसे लोगों का जीना दुस्वार हो जाता है। ऐसे में समाज, सरकार या प्रशासन भी इस दिशा में कोई ठोस कारवाई नही कर पा रही जिसके चलते आज सिकरहना(बुढ़ी गंडक) नदी किनारे बसे गाँवो, किसानों, मछुआरों सहित आम आवाम के लिए अभिशाप साबित हो रही है।

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