बांका: चांदन
प्रखंड मुख्यालय स्थित 500 वर्ष पुरानी दुर्गा मंदिर सिद्धपीठ के रूप में चर्चित है। यह मंदिर देवघर, बांका पक्की सड़क और ट्रेन रूट से भी पहुंचा जा सकता है। यह दुर्गा मंदिर जमींदार उदित नारायण टिकैत के पूर्वजों द्वारा पुत्र प्राप्ति की कामना को लेकर स्थापना की गई थी।
मंदिर का इतिहास
लोग बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना के बाद एक पूजा से दस पूजा तक रोजाना समय विधि विधान के साथ बंगला पद्धति से पूजा होती है। औऱ रात में स्थानीय महिलाओं द्वारा माता का भक्ति गीत भी गाया जाता है। सुबह औऱ शाम पूर्वजो से चल रहा ढोलिया परिवार ढ़ोल बजा कर माता के पूजा में शामिल होता है। अष्टमी औऱ नवमी को यहां 1000 से अधिक बकरे की बलि दी जाती है। साथ ही यहां महाष्टमी के दिन सुबह से शाम तक बच्चे बुजुर्ग औऱ सैकड़ो महिलाएं दंड दे कर माता को प्रसन्न करती है।
मंदिर की विशेषता
मंदिर में पूर्व से टिकैत परिवार की महिलाओं द्वारा ही मूर्ति विसर्जन के समय खोइचा देने की परंपरा थी। लेकिन उस परिवार के सदस्यों के समाप्त हो जाने के बाद अब कमेटी के पदाधिकारी के परिवार की महिलाएं ही विसर्जन के वक्त माता को खोइचा देती है। माना जाता है कि इस मंदिर में जो भी मनौती रखी जाती है वह निश्चित रूप से पूरा होता है।
क्या कहते हैं पुरोहित
मंदिर के आचार्य लालमोहन पांडेय और पूजक उपेंद्र पांडेय का कहना है कि यहां सिद्धि पीठ की पूजा बंगला पद्धति से होती है। मंदिर की व्यवस्था के लिए अध्यक्ष विक्रम कुमार दूबे, सचिव अशोक कुमार शर्मा और उपाध्यक्ष नीरज कुमार सिन्हा ने बताया कि यहां तीन दिनों का मेला भव्य होता है। जिसकी सारी व्यवस्था हमलोग मिलजुल कर करते है।
प्रखंड मुख्यालय स्थित 500 वर्ष पुरानी दुर्गा मंदिर सिद्धपीठ के रूप में चर्चित है। यह मंदिर देवघर, बांका पक्की सड़क और ट्रेन रूट से भी पहुंचा जा सकता है। यह दुर्गा मंदिर जमींदार उदित नारायण टिकैत के पूर्वजों द्वारा पुत्र प्राप्ति की कामना को लेकर स्थापना की गई थी।
मंदिर का इतिहास
लोग बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना के बाद एक पूजा से दस पूजा तक रोजाना समय विधि विधान के साथ बंगला पद्धति से पूजा होती है। औऱ रात में स्थानीय महिलाओं द्वारा माता का भक्ति गीत भी गाया जाता है। सुबह औऱ शाम पूर्वजो से चल रहा ढोलिया परिवार ढ़ोल बजा कर माता के पूजा में शामिल होता है। अष्टमी औऱ नवमी को यहां 1000 से अधिक बकरे की बलि दी जाती है। साथ ही यहां महाष्टमी के दिन सुबह से शाम तक बच्चे बुजुर्ग औऱ सैकड़ो महिलाएं दंड दे कर माता को प्रसन्न करती है।
मंदिर की विशेषता
मंदिर में पूर्व से टिकैत परिवार की महिलाओं द्वारा ही मूर्ति विसर्जन के समय खोइचा देने की परंपरा थी। लेकिन उस परिवार के सदस्यों के समाप्त हो जाने के बाद अब कमेटी के पदाधिकारी के परिवार की महिलाएं ही विसर्जन के वक्त माता को खोइचा देती है। माना जाता है कि इस मंदिर में जो भी मनौती रखी जाती है वह निश्चित रूप से पूरा होता है।
क्या कहते हैं पुरोहित
मंदिर के आचार्य लालमोहन पांडेय और पूजक उपेंद्र पांडेय का कहना है कि यहां सिद्धि पीठ की पूजा बंगला पद्धति से होती है। मंदिर की व्यवस्था के लिए अध्यक्ष विक्रम कुमार दूबे, सचिव अशोक कुमार शर्मा और उपाध्यक्ष नीरज कुमार सिन्हा ने बताया कि यहां तीन दिनों का मेला भव्य होता है। जिसकी सारी व्यवस्था हमलोग मिलजुल कर करते है।
पुलिस की व्यवस्था- तीन दिनों तक लगने वाला विशाल मेले में जिला में पुलिस की प्रतिनियुक्ति होने के बाद भी स्थानीय प्रशासन भी पूरी मेला व्यवस्था पर नजर रखती है।





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