आकर्षण का केंद्र बना कलुआ घाट का विशाल पंडाल

आकर्षण का केंद्र बना कलुआ घाट का विशाल पंडाल

बांका:छठव्रती को थोड़ी सुविधा मिले इसके लिए प्रखंड मुख्यालय के कुछ युवकों ने मिल कर 1986 में बेल्फेयर सोसाइटी नामक संस्था बनाया। औऱ उसी साल से पहले छोटा पंडाल जिसमे मूर्ति की जगह सिर्फ झंडा औऱ पेट्रोमेक्स से लाइट की व्यवस्था की जाती थी। उस वक्त व्रती की संख्या भी काफी कम होती थी। धीरे धीरे कमेटी तो वही रही लेकिन छठ व्रती की संख्या लगातार बढ़ती गई ,इसे देखते हुए उस संस्था ने अपने कामों में भी विस्तार देना शुरू किया। इसके लिए बाजार सहित कई युवकों द्वारा छोटे-छोटे चंदा वसूली कर 1996 में इस पंडाल के रूप को थोड़ा बढ़कर उसमें भगवान भास्कर की मूर्ति लगना प्रारंभ कर दिया। लगातार इसके विस्तार को देखते हुए इस वर्ष प्रखंड प्रमुख रवीश कुमार द्वारा सरकारी योजना के सौजन्य से पक्की सड़क से छठ घाट तक पीसीसी सड़क के अलावे नदी में उतरने के लिए सीढ़ी और कई चबूतरे के साथ कुर्सी का भी निर्माण कर दिया गया। जिससे वेलफेयर सोसाइटी को काफी राहत मिली और उसने विशाल पंडाल का निर्माण कराया यह पंडाल बंगाल के दुर्गा पूजा समिति के पंडाल के रूप में तैयार कराया गया। इसके लिए प्रखंड मुख्यालय के ही सत्यम डेकोरेटर को जिम्मेदारी दी गई जिसने कुल लागत डेढ़ लाख के लगभग बताया है सत्यम डेकोरेटर के संचालक अनिल कुमार मंडल बताते हैं की इस पंडाल को तैयार करने के लिए यूट्यूब से डाउनलोड कर पांच नबम्बर से रोजाना आठ मजदूर जो गिरिडीह,दुमका, औऱ बंगाल से आये है उसी कारीगर द्वारा पंडाल बनाया जा रहा है।जिसमे 400 से अधिक बांस लगाया गया है।इस बर्ष भी इस कमिटी में अध्यक्ष पद पर राकेश कुमार बच्चू,सचिव पप्पू शर्मा,औऱ केशव कुमार कोषाध्यक्ष के पद पर कार्यरत है। इस घाट पर उगते सूर्य को अर्घ देने के बाद शानदार कबड्डी खेल का आयोजन भी किया जाता है। जिसका बड़ी संख्या में लोग आंनद लेते है। यहां झारखंड के देवघर के भी कई व्रती परिवार यहां छठ के लिए आते है।इस प्रकार हर बर्ष आठ से दस हजार लोग इस घाट पर अंतिम दिन जमा होते है।

इस बर्ष की व्यवस्था-व्रती के लिए चेंजिग रुम, दूध,अगरबत्ती,माचिस,गर्म चाय, के अलावे संपूर्ण घाट पर सफाई रोशनी की व्यवस्था, के साथ संध्या अर्घ के बाद रात भर भजन कीर्तन की भी व्यवस्था किया गया है।

नामकरण- स्थानीय कुछ बुजुर्ग बताते है कि सैकड़ो बर्ष पूर्व यहां काला पत्थर युक्त घनघोर जंगल हुआ करता था। वहां एक तपस्वी बाबा तपस्या किया करते थे। उन्होंने एक शिवलिंग की स्थापना भी किया था। औऱ वे लगातार उस शिवलिंग की परिक्रमा एक कोल्हू (तेल निकालने की मशीन को कोल्हू कहते है) की तरह किया करते थे। औऱ काफी दिन बाद उस बाबा का वही निधन हो गया। तभी से उस जगह का नाम कोल्हुआ बाबा पड़ गया। जो अब कलुआ घाट के नाम से जाना है। आज भी वहां बड़े बड़े काले पत्थर औऱ शिवलिंग स्थापित है।


Post a Comment

0 Comments