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| — आदित्य कुमार दुबे, संपादक, चम्पारण नीति |
15 अगस्त की सुबह जब भारत का प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराता है, तो यह दृश्य केवल एक रस्म अदायगी नहीं होती। यह हमारे राष्ट्रीय इतिहास के सबसे गौरवशाली क्षण का प्रतीक है — वह दिन जब हमने विदेशी हुकूमत की बेड़ियों को तोड़कर अपना भाग्य स्वयं लिखना शुरू किया। यह केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं था, बल्कि एक ऐसी यात्रा की शुरुआत थी जिसमें हर भारतीय को स्वतंत्र और सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अधिकार मिला।
1947 की आज़ादी उन लाखों ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों की तपस्या का फल थी, जिन्होंने अपनी जान, संपत्ति और सुख-चैन देश के लिए न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे से लेकर भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद से लेकर खुदीराम बोस, रानी लक्ष्मीबाई से लेकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस तक, यह बलिदानियों की लंबी शृंखला है जिसने हमें यह अनमोल तोहफ़ा दिया। महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के मार्ग ने, और चंपारण जैसे सत्याग्रहों ने, जनता को यह सिखाया कि एकजुट होकर, बिना हथियार उठाए भी, साम्राज्यवादी ताकतों को चुनौती दी जा सकती है।
आज, जब हम स्वतंत्रता का 79वाँ वर्ष मना रहे हैं, यह सोचने का समय है कि क्या हम उस सपनों के भारत की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी कल्पना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी। स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं है; यह सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, अवसरों की समान उपलब्धता और मानव गरिमा की रक्षा का नाम है। यदि आज भी कोई बच्चा शिक्षा से वंचित है, कोई किसान अपने हक़ का दाम पाने के लिए संघर्ष कर रहा है, या कोई नागरिक अपने अधिकार के लिए व्यवस्था के दरवाज़े खटखटाने को मजबूर है — तो हमें मानना होगा कि हमारी यात्रा अधूरी है।
चंपारण की मिट्टी, जिसने गांधीजी के सत्याग्रह को जन्म दिया, हमें आज भी प्रेरित करती है। यह धरती कहती है कि संघर्ष केवल विरोध का नाम नहीं, बल्कि बदलाव की दिशा तय करने का माध्यम है। शिक्षा सुधार, कृषि संकट का समाधान, बेरोज़गार युवाओं के लिए अवसर सृजन, और समाज में भाईचारे की मजबूती — यही वे क्षेत्र हैं जिनमें हमारी अगली आज़ादी की लड़ाई लड़ी जानी है।
दुर्भाग्य से, स्वतंत्रता के बाद के दशकों में हमने कई उपलब्धियाँ हासिल करने के साथ-साथ कई चुनौतियों को भी जन्म दिया है। भ्रष्टाचार, जातिगत और धार्मिक विभाजन, पर्यावरण संकट, बेरोज़गारी, और ग्रामीण-शहरी असमानता आज भी हमें पीछे खींच रही है। डिजिटल इंडिया और अमृतकाल की बात तभी सार्थक होगी, जब इन चुनौतियों पर निर्णायक विजय मिलेगी।
इसलिए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें केवल उत्सव मनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह दिन हमें आत्ममंथन और नवीनीकृत संकल्प का अवसर देता है। हमें यह प्रण लेना चाहिए कि हम न केवल अपने अधिकारों के प्रति सजग रहेंगे, बल्कि अपने कर्तव्यों का भी ईमानदारी से पालन करेंगे।
हम ऐसा भारत बनाएँ जहाँ हर नागरिक को समान अवसर मिले, जहाँ किसी की प्रगति उसकी जाति, धर्म या आर्थिक पृष्ठभूमि से तय न हो, और जहाँ तिरंगा केवल हवा में नहीं, बल्कि हर दिल में लहराए।
क्योंकि सच्ची आज़ादी वही है, जो हर नागरिक के जीवन में अवसर, गरिमा और आशा का सूरज लेकर आए।
जय हिंद!
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