चम्पारण की प्राकृतिक विरासत को शब्दों में सहेजती पुस्तक का लोकार्पण


साहित्य परिषद् के आयोजन में साहित्य, शोध और पर्यावरण संरक्षण पर हुआ विमर्श; वक्ताओं ने डॉ. देवीलाल यादव के प्रयासों को सराहा

बेतिया। महारानी जानकी कुंअर महाविद्यालय, बेतिया के सभागार में रविवार को साहित्य, शोध एवं चम्पारण की प्राकृतिक विरासत पर केंद्रित कार्यक्रम का आयोजन किया गया। अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, बेतिया के तत्वावधान में आयोजित समारोह में परिषद् के जिला संरक्षक डॉ. देवीलाल यादव की पुस्तक “Champaran ke प्राकृतिक विरासत” का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर चम्पारण की प्राकृतिक संपदा, पर्यावरणीय विविधता और उसके वैज्ञानिक अध्ययन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए।

पुस्तक का लोकार्पण महारानी जानकी कुंअर महाविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. परमेश्वर भक्त ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. राजेश चंदेल ने की, जबकि अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के अध्यक्ष अंजनी कुमार सिन्हा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। मंच संचालन कृष्णमोहन हिंदू ने किया।

लोकार्पण के बाद संबोधित करते हुए डॉ. परमेश्वर भक्त ने डॉ. देवीलाल यादव के लेखन की विशेषता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “देवीलाल यादव जी केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि एक शोधार्थी हैं।” उन्होंने कहा कि रचनात्मक दृष्टि के साथ विषयों को शोधपरक ढंग से देखने की प्रवृत्ति उनके लेखन को विशिष्ट बनाती है।

डॉ. दिवाकर राय ने डॉ. देवीलाल यादव के साहित्यिक एवं पर्यावरणीय योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि चम्पारण की प्राकृतिक विरासत जैसे विषय को पुस्तक के माध्यम से सामने लाना क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

पुस्तक की शोधपरक उपयोगिता पर चर्चा करते हुए डॉ. विभाकर दूबे एवं विभांक धर मिश्र ने इसे विज्ञान के शोधार्थियों के लिए उपयोगी सामग्री बताया। उन्होंने कहा कि पुस्तक में चम्पारण की प्राकृतिक विरासत से जुड़े विषयों को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह शोध एवं अकादमिक अध्ययन के लिए उपयोगी हो सकता है।

वहीं कृष्णमोहन हिंदू ने विद्यार्थियों के संदर्भ में पुस्तक की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए इसे शोध-विषयों के लिए एक ‘कुंजी’ बताया। उन्होंने कहा कि स्थानीय प्राकृतिक विरासत और उससे जुड़े विषयों पर शोध करने वाले विद्यार्थियों को ऐसी पुस्तकें दिशा देने का काम करती हैं।

वक्ताओं ने कहा कि चम्पारण की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व तक सीमित नहीं है। यहां की प्राकृतिक संपदा, पर्यावरणीय विविधता और जैविक विरासत भी क्षेत्र की विशिष्ट पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका दस्तावेजीकरण वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।

समारोह में उपस्थित साहित्यकारों, शिक्षाविदों एवं शोधार्थियों ने पुस्तक के प्रकाशन को चम्पारण की प्राकृतिक विरासत को साहित्यिक और शोधपरक दृष्टि से सामने लाने की पहल बताया। वक्ताओं के अनुसार, पुस्तक स्थानीय प्राकृतिक संपदा और उससे जुड़े विषयों को पाठकों तथा शोधार्थियों तक पहुंचाने में उपयोगी भूमिका निभा सकती है।

कार्यक्रम में प्रशांत सौरभ, लालबाबू शर्मा, सुरेश कुमार गुप्त, नंदकिशोर प्रसाद यादव, अखिलेश्वर कुमार, खूबलाल पंडित, विष्णुकांत मिश्रा, दीपेन्द्र कुमार, विनोद तिवारी, विनोद कुमार यादव, संजय यादव, आदित्य कुमार, जयेश कुमार, प्रभाकरमणि यादव, इंदु कुमारी, सुषमा शर्मा, चंदा कुमारी, अंजना आर्या, प्रमोद कुमार, अरविंद कुमार शर्मा, डॉ. जगमोहन कुमार, जगदेव प्रसाद, अली अहमद, डॉ. किशोरीलाल, लालन पांडे लहरी, चंद्रिका राम, अरुण गोपाल एवं संतोष कुमार सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, शिक्षक, शोधार्थी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में नंदलाल गुप्तार्य ने उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

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