बेरोजगारी देश की सबसे बड़ी समस्या है





  • (अजय प्रताप तिवारी/ अध्येता, इतिहास)
  • भारत की गरीबी का एक मुख्य कारण देश में फैली बेरोजगारी है । यह देश की एक बड़ी समस्या है, जो शहरो और गांवो में समान रूप से व्याप्त है । यह एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है, जो आधुनिक युग की देन है । हमारे देश में इसने बड़ा गम्भीर रूप धारण कर लिया है आज हम पूरे विश्व में गर्व से कहते हैं कि भारत युवाओं का देश है। लेकिन मौजूदा समय में बड़ी चुनौती यह है कि युवाओं की शक्ति का सही इस्तेमाल कैसे हो, इसके लिए युवाओं में कौशल का विकास , रोजगार आदि के उपाय किया जाना जरूरी है। बेरोजगारी के कारण देश में शान्ति और व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया है । अत: इस समस्या के तत्काल निदान की आवश्यकता है इस गम्भीर समस्या के अनेक कारण हैं । बड़े पैमाने पर मशीनों का अंधाधुंध प्रयोग ,निजीकरण बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण है ।इनके कारण मनुष्य के श्रम की आवश्यकता बहुत कम हो गई है । इसके अलावा हमारी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है । जनसंख्या की वृद्धि के अनुपात से उत्पादन के कमी तथा रोजगार के अवसरों में कम वृद्धि होती है । इसलिए बेरोजगारी लगातार बढती ही जाती है । भारत में व्याप्त अशिक्षा भी बेरोजगारी का मुख्य कारण है । आज के मशीनी युग में शिक्षित और कुशल तथा प्रशिक्षित व्यक्तियो की आवश्यकता पडती है । इसके अलावा, हमारी शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है । हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में साक्षरता को ही विशेष महत्त्व देते हैं । व्यावसायिक तथा तकनीकी शिक्षा की अवहेलना होती है । तकनीकी शिक्षा का जो भी प्रबन्ध है, उसमे सैद्धांतिक पहलू पर अधिक जोर दिया जाता है और व्यावहारिक पहलू पर ध्यान नहीं दिया जाता । बढ़ती आबादी के साथ ही बेरोजगारी पुरे विश्व में एक बड़े संकट के रूप में उभर के सामने आया है । खासकर भारत में सबसे ज्यादा बेरोजगारी की समस्या है ।एक रिपोर्ट के अनुसार बढ़ती बेरोजगारी के मामले में भारत एशिया में सबसे आगे है ।हम अन्य देशों की बात करे तो फिलीपींस 5.6 फीसद ,इंडोनेशिया 5.5 और चीन में 4.0 फीसद ,जापान 2.8 फीसद है। इस बेरोजगारी का कारण भारत में व्याप्त अशिक्षा भी बेरोजगारी का मुख्य कारण है । आज के मशीनी युग में शिक्षित और कुशल तथा प्रशिक्षित व्यक्तियो की आवश्यकता पड़ती है । हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में साक्षरता को ही विशेष महत्त्व देते हैं । व्यावसायिक तथा तकनीकी शिक्षा की अवहेलना होती है । तकनीकी शिक्षा का जो भी प्रबन्ध है, उसमे सैद्धांतिक पहलू पर अधिक जोर दिया जाता है और व्यावहारिक पहलू पर ध्यान नहीं दिया जाता । यही कारण है कि हमारे इंजीनियर तक मशीनो पर काम करने से कतराते हैं । साधारण रूप से उच्च शिक्षा प्राप्त करके हम केवल नौकरी करने लायक बन पाते हैं । शिक्षा में श्रम को कोई महत्त्व नही दिया जाता । अत: शिक्षित व्यक्ति शारीरिक मेहनत के काम करने से कतराते हैं।हाल ही में उच्च शिक्षा के लिए विश्व के ख्यात विश्वविद्यालयों, पाठ्यक्रमों, छात्रों व रोजगार के अवसरों पर हुए सर्वे ने भारतीय उच्च शिक्षा की वास्तविकता उजागर की है। इस सर्वे से साफ होता है कि आज भारत पढ़े-लिखो का अनपढ़ देश बन चुका है। हमारी तामझाम वाली उच्च शिक्षा हकीकत से कोसों दूर है, जबकि हम अपनी झूठी शान की तूती ही बजाते फिर रहे हैं।हम अमेरिका, इंग्लैंड, चीन व जापान जैसे देशों की तुलना में कहीं भी खड़े दिखाई नहीं देते, जबकि इन देशों में छात्रों को न तो हाथ पकड़कर लिखना सिखाया जाता है और न ही वहां के पाठ्यक्रम भारत की तरह बेबुनियादी होते हैं।आज के प्रगतिशील सभ्य देशों में मनोविज्ञानी छात्रों की प्रगतिशील अवस्था से ही व्यक्तिगत रुचि और प्रवृत्तियों का अध्ययन करने लगते हैं और जिस ओर उनकी प्रतिभा एवं व्यक्तिगत गुणों का सर्वाधिक विकास संभव हो सकता है, उसी ओर उन्हें जाने की सम्मति देते हैं । यही कारण है कि हमारे देश की अपेक्षा वहाँ कहीं अधिक मौलिक विचारक, विज्ञानवेत्ता, अन्वेषक और कलाकार पैदा होकर राष्ट्र के गौरव में चार चाँद लगा देते हैं ।हमें अपने यहाँ की प्राकृतिक स्थितियों-परिस्थितियों और उलझनों का हल मिट्‌टी व पानी से निकालना श्रेयस्कर होगा । गाँवों के देश भारत की समृद्धि संभवत: नागरिक पाश्चात्य पद्धति से पूर्णत: न हो सके, इसे भी भुलाना नहीं होगा । तभी भारत का सर्वांगीण विकास संभव है ।

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