उलझते जा रहे रिश्ते

 टूटते, घुटते जा रहे रिश्ते

प्रेम, स्नेह, भाईचारा, अपनत्व,
दरकते , सिसकते जा रहे अब
गांठ में उलझते जा रहे रिश्ते।
संयुक्त परिवार की परिभाषा
अब खत्म ही हो गई है,
एकल परिवार का बोलबाला
चहुं दिशा में फ़ैल रही है।
माता - पिता की उपेक्षा
बच्चे आज करने लगे हैं,
बच्चों को भी समय अपना
मां बाप नहीं दे पा रहे हैं।
मजबूरियां सबकी अपनी है
प्राथमिकताएं भी बदलने लगी है,
समय के साथ चलने की कोशिश में
जीवन के सारे मूल्य फिसलने लगे हैं।
आने वाले समय में तो
परिस्थिति और भी भयावह होगी,
'पर' की भावना तो होगी ही नहीं
'स्व' में ही दुनिया समाहित होगी।  

नीलू गुप्ता
सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

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