कई संघर्षो से भरी है
एक औरत की कहानीहर मोड़ पर ठोकर मिलती
बचपन हो या हो जवानी
समाज से लेकर घर तक, भेद - भाव पर
निकलता है उसके आँखों से पानी
बचपन हो या हो जवानी
जब अपने होश संभाल कर
होना चाहती हैं वो अपने पैरों पर खड़ी
कर देते हैं सामने खड़ी कई परेशानी
बचपन हो या हो जवानी
सब कुछ छुड़ा कर ,सब खुशियां छीनकर
छुड़ा देते हैं हर निशानी
बचपन हो या हो....
नहीं सहा जाता है ये अपमान,
फिर औरत ना बनाना ए खुदा
बस करना ये मेहरबानी ....
- गुलशन पाण्डेय
मधेपुरा , बिहार

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