शुक्रिया तेरा ऐ कोरोना, आंखें सब की खोल दिया,
जीने के लिए क्या है जरूरी, तूने सबको बता दिया!
डॉक्टर मना करते थे, तेल मसाले से परहेज करो,
बिखेरा ऐसा जाल, खाना दाल रोटी सीखा दिया!
संवार था पैसे का भूत, झूठी शान का था दिखावा,
सादगी से जीने का तरीका, तूने सबको सीखा दिया!
कहां गए पिज़्ज़ा बर्गर, बिरयानी और तंदूरी चिकन,
भूख मिटाने क्या है जरूरी, एहसास तूने करा दिया!
अब कहां गए शादियों में, अरमान पूरा करने वाले,
सादगी से भी डोली उठती, तूने सबको बता दिया!
नहीं समझते थे, मजहबी किताबों में लिखी बाते,
मौत का डर दिखाकर, आंखों से पड़दा हटा दिया!
कवि:- मुख्तार शेख 'मनमाडी'
8600700786

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