गहन अंधेरी रात में, लोकतंत्र है लैम्प
लोकतंत्र में लोक की, यही रही औकात
उनके हिस्से रोशनी ,अपने हिस्से रात
जब राजा धृतराष्ट्र सम, गांधारी सम राज्य
खून डकैती अपहरण , जनता का दुर्भाग्य
वही एक रस जिंदगी ,वही एक सी चाल
तारीख़ें बदली मगर ,समय रहा बदहाल
किसे फिक्र है राष्ट्र की, सबको अपनी चाह
ले वादों की चाशनी , ढकिये लाख गुनाह
हो भविष्य स्वर्णिम सफल ,आज़ादी का ख़्वाब
आंख खुली तो हाथ थे, झुलसे हुए गुलाब
वोट लिए वादे किए, बन बैठे महिपाल
भूल गए इस देश में ,रोटी बड़ा सवाल
स्वर्णिम सपनों के लिए, मौन हुए संवाद
हुआ कसैला अंततः ,आज़ादी का स्वाद
गूंज रहे हैं हर तरफ ,देशभक्ति के गीत
फिर क्यों कटुता बढ़ रही ,गौर कीजिए मीत
कौन हुआ आज़ाद है, अब तक कौन ग़ुलाम
स्वयं ज़मीनी देखिए, आजादी - परिणाम
देशभक्ति है एक दिन, लूट देश की नित्य
स्याह रात की चाह में, डूब गया आदित्य
आलोचक चुभने लगे ,सत्ता घूरे नैन
लोकतंत्र घायल यहां, भय कांपे दिन रैन
गाएंगे हम सब पुनः, राष्ट्र प्रेम के गीत
पहले दंगा हो शुरू, फिर जोड़ेंगे प्रीत
भूख गरीबी ज़िल्लतें, आंतों का उन्माद
आज़ादी के सामने , मुखर यही संवाद
तरह तरह के आंकड़े ,रोज नयी चौपाल
शोर-शराबे में कहीं ,दुबका मूल सवाल
- नज़्मसुभाष

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