इंतजार

इंतजार


अगर गर्मियों के शाम को यादों में बंधना हो तो कहानी बेहतर होगी क्या ? नहीं मुझे लगता है कि सबसे सटीक रहेगी कविताएं , कच्ची सी कविताएं , जो अक्सर गहरे प्रेम में पड़े लोग लिखा करते हैं ।

कैसी नादानी कैसा कोरापन होता है उन कविताओं में जैसे किसी ने अपना मन निकाल पन्ने पर रख दिया हो। 

यूनिवर्सिटी की दहलीज पार कर  कॉन्सलिंग के भीड़ में जाकर बैठ कर मैं बेवजह सोच रही थी । पुरानी आदत थी मेरी कुछ भी बेवजह सोचने लगना। अचानक से उन दोनों ने मुझे पुकारा तो मैं अपने ख़यालो से बाहर आई । उन दोनों के चेहरे पे मुस्कुराहट के एक नायाब अंदाज को देख मुझे लगा कि जिंदगी खुल के जीना भी कितना खूबसूरत होता है न। उन दोनों की दोस्ती के अंदाज और खूबसूरत हँसी को देख कर मुझे लगा कि शायद ये दोस्ती के लिए परफेक्ट है । लेकिन मन बड़ा घबरा रहा था । कि क्या दोस्ती सच्ची वाली होगी , बिल्कुल उस पहले प्रेम की भांति जिसके कल्पना मात्र से ही मन प्रफुलित हो जाता है ऐसा लगने लगता है जैसे कि कुछ भी ना हो मेरे पास तो भी मै इनके साथ को पा कर खुश तो रह सकती हूं। मन इस उथलपुथल से गुजर रहा था कि दोस्ती में भी क्या ऐसे खूबसूरत एहसास हो सकते हैं । क्या ये भी उन दोस्तो के तरह तो नही होंगे न जो सिर्फ मतलब से याद करते हो , मेरी यही सोच हर रिश्ते को कायम करने से पहले ही बिखेर देती है । इस उथल पुथल से एक अजीब नकारात्मक भाव मन में उत्पन्न हो रहा था , जिससे मैं चाह कर भी बाहर नही आ पा रही थी। 

इन्ही बातो को सोचने के क्रम में एक हल्की सी आवाज मेरे कानों तक पहुँची (कितनी खूबसूरत है न ये लड़की) मैं अचानक से पीछे मुड़ कर देखी तब तक वो थोड़े सहम से गए उन्हें लगा जैसे मैने उनकी बातें सुन ली। फिर मैं थोड़ा मुस्कुराई और उन दोनों से पूछी ? एड्मिसन लेने आए हो ? तो उनमें से एक ने बोला नहीं हम तो सोचे कि थोड़ा घूम ले फिर चले जाएंगे , मुझे तो थोड़ा गुस्सा आया फिर भी मैं हल्के मुस्कुराहट के साथ अपने चेहरे को घुमा कर उनके तरफ पीठ कर दी और मन मे सोचने लगी कि कितना बत्तमीज़ लड़का है जी। तभी हल्का मुस्कुराता हुआ दूसरा लड़का मुझसे बोला hii मैं पार्थ और तुम? थोड़े सवालिये अंदाज के साथ मैने भी फुल अत्तिटुडे में कहाँ मैं माया । मुझे उन दोनों को देख कर उनकी बातों को सुन कर पहले ही ऐसा एहसास हो गया था कि वो बचपन के दोस्त होंगे या फिर बहुत गहरी मित्रता होगी। फिर पीछे वाली कुर्सी से उठ आगे आ गया वो बत्तमीज़ लड़का जिसके बातो को सुन कर मुझे गुस्सा आया था बहुत बदमाश था वो ! बिल्कुल पसंद नही थी उसके चेहरे की मुस्कुराहट , उसके मुस्कुराने के अंदाज से ही मुझे लगता था कि वो थोड़ा फल्टर है। शायद मैं उसे अच्छे से जानती नही थी इसलिए भी ऐसी धारणा बन रही होगी जो कि मेरी पुरानी आदत थी कुछ भी सोच लेना किसी के बारे में , खैर मुझे कौन सा जन्म जन्म का रिश्ता रखना था जो उसके बारे में इतना सोचु । 

बोटल होगा आपके पास उसने पूछा? प्यास लगी है मुझे ! मन तो ये कह रहा था कि बोल दु जा कर बाहर क्यों नही पी लेते फिर भी मन मसोस कर उसको बॉटल दे दी । तभी पार्थ  ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा कि तुम बहुत चिंतित दिख रही हो क्या हुआ तुम्हे ? मै मुस्कुराती हुई चिंता के लकीरों को छिपाते छिपाते उसे जबाब दी नहीं कुछ नहीं हुआ। लेकिन मैं वाकई बहुत चिंतित थी । अपने एडमिशन को ले के क्योंकि पहली बार मुझे एड्मिसन नही मिल पाया था यहाँ पे। 

अजीब सा इतेफाक होता है न कभी कभी इस जीवन में की कोई सोचाता भी नहीं जिन बातों को वो बातें , वो व्यक्ति ,वो पल आपके जीवन के सबसे खूबसूरत से एहसासो का हिस्सा बन जाते हैं। जिसे जीने की ख्वाहिश तो फिर से होती है लेकिन हालात और वक़्त इतने मजबूर कर देते हैं कि आदमी के पास उन खूबसूरत एहसास और उस बीते समय के यादों के सिवा कुछ नही बचता।  

एड्मिसन तो सभी को मिल गया था और मेरे एड्मिसन मिलने के बाद उस फल्टर के चेहरे पे साफ साफ खुशी दिखाई दे रही थी ऐसा लग रहा था जैसे मेरे आने से उसको कोई तगमा मिल जाने वाला है। खैर समय बीतता गया वक़्त रुकता कहाँ है किसी के इंतजार में ! दोस्ती भी हुई उन दोनों से बहुत गहरी दोस्ती और मैने जैसी दोस्ती सोची थी बिल्कुल वैसी वाली दोस्ती , कदम से कदम मिला के चलने वाले दोस्त थे वो । उन पलों को उन एहसासों को याद कर के आज भी मेरी आँखों नम हो जाती है। यूनिवर्सिटी के आखिरी दिन थे फेयरवेल पार्टी चल रही थी , लेकिन वो फल्टर बड़ा उदास बैठा था, जिसके आँखों मे पिछले दो सालों में बस एक बार ही मुझे आँसू दिखा था। आज फिर से उसकी आँखें इतनी नम क्यों थी , लॉन में अकेले अपने आँखों को नम किये बैठा फ़इरथा । मैं उसके पास गई और बैठ गई तो उसने अपने आँखों के आंसू को पोछते हुए बोला तुम यहाँ ? मैं बोली थोड़े मजाकिया अंदाज में तुम यहाँ तो हम कहाँ जाएंगे । वो हल्का Jमुस्कुराते हुए बड़ी संजीदगी से मुझसे पूछा फिर कब मिलना  होगा । मैं थोड़ी सहम सी गई मुझे उसके बातो से ऐसा लगा कि वो अंदर से डर से गया है साथ छूटने के डर से लेकिन मैं खुद को संभाल कर बड़े सहज भाव से बोली वादा करती हूं तुमसे ! जब भी मुझे वक़्त मिला इस जीवन के झंझावातों से तो हम सब फिर से इकठ्ठा होंगे।

 ये वादा किये पूरे 12 साल बीत चुके लेकिन शायद उस शाम किये वादे पे मैं खरी नही उतर पाई। अफसोस बस इस बात की है कि मुझे उससे वादा नही करना चाहिए था । बस बोल देती की फल्टर कोशीश करूंगी की हमलोगों की मुलाकात फिर से हो .......

क्या उसके मन मे ये सवाल बार बार उठता होगा क्या की उस आखिरी शाम का वादा झूठा था या वो जिंदगी के झंझावातों में इतनी मसगुल हो गई कि उसका मुझसे किया हुआ वादा  याद नहीं ...।

   अब बस  इंतज़ार है उस खूबसूरत से पल का जिस दिन हम फिर मिले ।

शशिरंजन कुमार मिश्रा 

महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय , masters in journalism and mass communication

Post a Comment

0 Comments