सूर्य देव की अद्वितीय प्रस्तर प्रतिमा सुकेत रियासत की ऐतिहासिक राजधानी पांगणा के महिषासुर मर्दिनी माता मंदिर के परिसर में मिलने से यहाँ के इतिहास की प्राचीनता पर दृष्टिपात होता है। कला पक्ष की दृष्टि से इस मूर्ति को 12वी शताब्दी का माना जा रहा है। सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच के अध्यक्ष डाक्टरा हिमेन्द्र बाली’हिम”का कहना है कि भगवान सूर्य हिंदू परंपरा के पंचदेवो में माने जाते हैं।भारतीय देव पूजा पद्धति में गणेश,सूर्य,देवी,शिव,विष्णु की आराधना का विधान है।पांगणा के देहरी माता मंदिर मे इन पांचों देवी-देवताओं की मूर्तियां खुदाई में निकली हैं। सूर्य का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है। सूर्य को वैदिक ऋषि कश्यप और अदिति का पुत्र माना जाता है।वैवस्तु मनु,यम और यमुना उनके पुत्र और पुत्री हैं।पांगणा में खुदाई में मिली इस मूर्ति के सिर के पृष्ठ भाग में आभामंडल है जो धर्म चक्र का प्रतीक है।हिंदू धर्म की मूर्ति परंपरा में सूर्य देव की स्थानक मुद्रा में दोनों हाथों में सूर्य भगवान पुष्प लिए हुए हैं।पांचवी शताब्दी के वाराह मिहिर प्रणित ग्रंथ वाराहा संहिता में कहा गया है कि सूर्य के दो हाथ हो और सिर पर मुकुट हो इस प्रतिमा में सूर्य को उनके जूतों के साथ नहीं दर्शाया गया है। आरंभ की ईशा शताब्दियों की भारतीय सूर्य प्रतिमा कला पक्ष की दृष्टि से इरान यूनान की प्रतिमाओं की तरह है। इन पर ईरानी यूनानी और सिथियन प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। सूर्य की प्रतिमा में उन्हें ऊँचे जूतों की व्यंजना से यूनानी और कुषाण कला प्रभाव दर्शाता है। पांगणा से प्राप्त मूर्ति में सूर्य की छोड़ी पर लंबी दाढ़ी के रूप में दर्शाना ईरानी कला प्रभाव के कारण है। सतलुज घाटी के इस क्षेत्र में सूर्य की ऐसी वैभवपूर्ण मूर्ति का मिलना पांगणा के गौरवशाली इतिहास को सुस्पष्ट करता है।डाक्टर हिमेन्द्र बाली हिम का कहना है कि आठवीं शताब्दी के मध्य में कश्मीर पर कर्कोटक वंश के शासक ललितादित्य मुक्तापीठ का राज्य था।
जिसने श्रीनगर में प्रसिद्ध सूर्य मंदिर मार्तंण्ड का निर्माण किया था।ललितादित्य ने रावी और सतलुज के बीच जालंधर त्रिगर्त क्षेत्र अंतर्गत इस क्षेत्र में अधिपत्य स्थापित किया। हो सकता है कि उसी समय पांगणा में सूर्य की पूजा का प्रभाव बढ़ा हो। और यहां सूर्य की प्रतिमा की स्थापना हुई हो।ऐसी संभावना है कि सूर्य पूजा के प्रभाव के चलते पांगणा में शक्ति मंदिर में सूर्य की मूर्ति को प्रतिष्ठित किया गया है।अत: इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के चलते पांगणा के इस शक्ति मंदिर में सूर्य की मूर्ति को प्रतिष्ठित किया गया हो।अतः इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के चलते मूर्ति की स्थापना का काल आठवीं-नवीं शताब्दी बैठता है।कला की दृष्टि से यह मूर्ति काओ-ममेल के मंदिरों में स्थापित प्रतिहार शैली की मूर्तियों से कम नहीं है।।12वी-13वी शताब्दी में मुसलमानों के आक्रमण के कारण सूर्य पूजा में ह्रास आ गया। जिस कारण सूर्य पूजा गौण हो गई और इसका शैव और वैष्णव मत में विलय हो गया।पांगणा की सूर्य प्रतिमा के पैरों के पास सारथी अरुण करबद्ध बैठे हैं।सूर्य के अधोभाग में उनकी पत्नियां उषा और प्रत्यूषा आयुद्ध धारण कर जैसे अंधेरे का भेदन कर रही हैं। ऊपरी भाग में विद्यालय पंख फैलाए आकाश में विचरण को तैयार हैं।सूर्य पूजा पद्धति सनातन परंपरा की अभिन्न अंग है। उत्तर भारत में मकर संक्रांति का त्योहार सूर्य को समर्पित है।पांगणा मे मिली सूर्य की स्थानक प्रतिमा अपने कला वैभव और गरिमा के कारण यहां की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को गौरवशाली बना देती है। संभव है कि सूर्य पूजा यहां कर्कोटक वंशीय ललितादित्य ने प्रतिष्ठित की हो या कालांतर में 9वीं 10वीं शताब्दी में यह मूर्तियां स्थापित की हो। पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा स्वर्गीय चंद्रमणी कश्यप राज्य पुरातत्व चेतना पुरस्कार से सम्मानित डाक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि सूर्य देव की इस मूर्ति की शोभा देखते ही बनती है।खुदाई मे मूर्ति के प्रकट होने के बाद डाक्टर जगदीश शर्मा ने भाषा एवं संस्कृति निदेशालय के सेवानिवृत्त डिप्टी डायरेक्टर चुनीलाल कश्यप और हिमाचल प्रदेश के राज्य संग्रहालय के प्रभारी संग्राध्यक्ष डाक्टर हरि चौहान से संपर्क कर इस मूर्ति के दिव्य विग्रह के स्वरूप व इसके निर्माण काल की जानकारी प्राप्त कर मंदिर की देखरेख करने वाले पुजारी शनि शर्मा को इस मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर रखवा दिया।डाक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि देहरी के इस मंदिर में एक विकसित सभ्यता का बेशकीमती पुरातात्विक खजाना दबा पड़ा है।
जिसकी कदर अभी तक कोई नहीं जान पाया है।डाक्टर जगदीश शर्मा, व्यापार मंडल पांगणा के अध्यक्ष सुमित गुप्ता,महामाया मंदिर पांगणा के अध्यक्ष कुशल महाजन,सचिव अनुपम गुप्ता,वैज्ञानिक विपुल शर्मा,सुभाषपालेकर प्राकृतिक खेती की जिला सलाहकार लीना शर्मा का कहना है कि इस स्थान पर पुरातात्विक धरोहरों को खोजने व संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग को वैज्ञानिक और व्यवस्थित प्रयास करने के साथ संस्कृति की अमूल्य धरोहर देहरी माता मंदिर रूपी इस ज्योति स्तंभ के जीर्णोद्धार के साथ यहाँ आस पास निकली मूर्तियो के रख-रखाव के लिए संग्रहालय कक्ष के निर्माण का भरसक प्रयास करना चाहिए। ताकि इस अमूल्य निधि का रक्षण हो सके।आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर पागणा क्षेत्र राजनीतिं व कला पक्ष से काफी उर्वर रहा है। बंगाल के सेन वंशीय राजा वीरसेन ने यहां सुकेत रियासत की पहली स्थाई राजधानी की स्थापना भी की थी।दलगत राजनीतिक भेदभाव के चलते भले ही पांगणा आज अपने गौरवपूर्ण इतिहास को पाने में छटपटाहट रहा हो लेकिन सुकेत रियासत की स्थापना से लेकर सुकेत के भारत संघ में विलय तक की लंबी यात्रा में पांगणा वासियों ने समाज तथा राष्ट्र के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।पांगणा में देवकृपा से प्रकट हुई सूर्य देव की अद्वितीय मूर्ति से हमें अपनी संस्कृति और इतिहास का वह स्वरूप प्रत्यक्ष देखने को मिला है जिसके हम अधिकारी हैं।
-डाक्टर हिमेन्द्र बाली’हिम”कुमारसैन,
डाक्टर जगदीश शर्मा पांगणा।


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