=- कविता -=
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है रग - रग तेरा फ़ौलादी
अपने को तनिक निहारो तुम
जो सरहद पे तुमसे टकराए
आनन फानन मे मारो तुम
कभी विदेशी चूहों को
सरहद पे ना रुकने देना
तुम ओढ़ तिरंगा आ जाना
पर शीश नही झुकने देना
सौगंध है भारत माता की
मिट्टी की कर्ज उतारो तुम
जो सरहद पे तुमसे टकराए
आनन फानन मे मारो तुम
जो प्रहार करे तुम पर
तुम काटो उसके शीशों को
सबक सिखाना है तुमको
उन बौने भाल कपीशों को
चट्टानी ताकत दिखलाओ
अरि को अब ललकारो तुम
जो सरहद पे तुमसे टकराए
आनन फानन मे मारो तुम
राम कृष्ण की धरती है
यह है झाँसी की रानी की
है शुभाष चंद्रशेखर जैसे
कुंवर सिंह बलिदानी की
बम बारूद से खेलो होली
ले समशीर संघारो तुम
जो सरहद पे तुमसे टकराए
आनन फानन मे मारो तुम
जान भले चल जाए तेरा
तुम मान नही घटने देना
जीते जी भारत माता की
सम्मान नही घटने देना
आँख दिखाए आँख फोड़ दो
रण बीच मे उसे पछाड़ो तुम
जो सरहद पे तुमसे टकराए
आनन फानन मे मारो तुम
नवल प्रसाद
बेतिया, प -चम्पारण