ड्रैगन फ्रूट की खेती ने बदली पश्चिम चम्पारण के किसान की तकदीर
*प्रतिवर्ष 50 कुंटल उत्पादन और लाखो की आय*
चम्पारण नीति / बेतिया (पश्चिम चम्पारण)
खेती की बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और पारंपरिक फसलों से सीमित आय के बीच पश्चिम चम्पारण जिले के नौतन प्रखंड स्थित जयनगर गांव के युवा एवं प्रगतिशील किसान श्री संजय कुमार ने खेती में नवाचार और फसल विविधीकरण का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो आज क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। धान, गेहूं, मक्का और पारंपरिक सब्जियों की खेती से आगे बढ़ते हुए उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), माधोपुर के वैज्ञानिकों के तकनीकी मार्गदर्शन में ड्रैगन फ्रूट की वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक खेती को अपनाया। वर्तमान में श्री संजय कुमार ने लगभग 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र में 600 सीमेंट पोल, गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री और ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से ड्रैगन फ्रूट का आधुनिक बाग विकसित किया है। उनके बाग से प्रतिवर्ष लगभग 5 टन उच्च गुणवत्ता वाले ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन प्राप्त हो रहा है।
यह सफलता इस बात का उदाहरण है कि वैज्ञानिक तकनीकों, उचित फसल चयन और निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन के माध्यम से सीमित क्षेत्र से भी कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।
*पारंपरिक खेती से सीमित आय ने बदलने को प्रेरित किया*
श्री संजय कुमार लंबे समय से धान, गेहूं, मक्का तथा विभिन्न सब्जियों की खेती करते रहे हैं। हालांकि, खेती की बढ़ती लागत, मौसम में अनिश्चितता, उत्पादन जोखिम तथा कई बार फसलों के अपेक्षाकृत कम बाजार भाव के कारण पारंपरिक खेती से अपेक्षित आय प्राप्त नहीं हो पा रही थी। लगातार बढ़ते कृषि खर्च और सीमित लाभ के कारण उन्होंने खेती को अधिक लाभकारी बनाने के लिए नई और उच्च मूल्य वाली फसलों की संभावनाओं पर विचार करना शुरू किया।
इसी दौरान उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर के वैज्ञानिकों से संपर्क किया। केंद्र द्वारा उपलब्ध कराए गए तकनीकी परामर्श, वैज्ञानिक प्रशिक्षण तथा केवीके परिसर में स्थापित ड्रैगन फ्रूट की प्रदर्शन इकाई के अवलोकन ने उन्हें इस फसल की व्यावसायिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया। वैज्ञानिकों से तकनीकी जानकारी प्राप्त करने के बाद उन्होंने पारंपरिक खेती के साथ उच्च मूल्य वाली बागवानी फसल को जोड़ने का निर्णय लिया।
*वैज्ञानिक मार्गदर्शन में स्थापित किया आधुनिक ड्रैगन फ्रूट बाग*
कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर के तकनीकी सहयोग से श्री संजय कुमार ने वर्ष 2023-24 में लगभग 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र में ड्रैगन फ्रूट का व्यावसायिक बाग स्थापित किया। बाग की स्थापना के दौरान वैज्ञानिक पद्धति से पौधों की रोपाई, उचित दूरी, सहारा व्यवस्था तथा जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया।
ड्रैगन फ्रूट की बेलों को मजबूत सहारा देने के लिए बाग में लगभग 600 सीमेंट पोल लगाए गए। इन पोलों के सहारे पौधों की बढ़वार को व्यवस्थित किया गया। पौधों के बीच लगभग 9 × 6 फीट की दूरी रखी गई तथा प्रति एकड़ लगभग 2,500 अच्छी गुणवत्ता वाले पौधे लगाए गए। पौधों की गुणवत्ता और उचित रोपण व्यवस्था के कारण बाग में पौधों की बढ़वार अच्छी रही।
पानी के कुशल उपयोग और पौधों को आवश्यकतानुसार सिंचाई उपलब्ध कराने के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाई गई। इससे पानी की बचत के साथ-साथ पौधों की जड़ों तक नियंत्रित रूप से नमी पहुंचाने में सहायता मिली। समय-समय पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार पोषक तत्व प्रबंधन, सिंचाई, पौधों की देखभाल तथा अन्य आवश्यक कृषि कार्य किए गए। वैज्ञानिक पद्धति से बाग का प्रबंधन करने के परिणामस्वरूप पौधों की अच्छी वृद्धि हुई और कम समय में फल लगना शुरू हो गया।
लगभग 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र से प्रतिवर्ष 5 टन उत्पादन ने श्री संजय कुमार की खेती को पहले की तुलना में अधिक लाभकारी बनाया है। यह मॉडल दर्शाता है कि छोटे एवं मध्यम आकार के कृषि क्षेत्र में भी उपयुक्त फसल चयन और वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
*वैज्ञानिक खेती और सरकारी सहयोग से लिखी सफलता की नई इबारत*
...कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर के वैज्ञानिकों से प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करने के बाद श्री संजय कुमार ने वर्ष 2023-24 में लगभग 0.40 हेक्टेयर (लगभग एक एकड़) क्षेत्र में ड्रैगन फ्रूट का व्यावसायिक बाग स्थापित किया। इस बाग को वैज्ञानिक तरीके से विकसित करने के लिए लगभग 600 आरसीसी (सीमेंट) पोल लगाए गए तथा जल की बचत और पौधों की बेहतर वृद्धि के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित की गई। पौधों को लगभग 9 × 6 फीट की दूरी पर लगाया गया, जिससे प्रति एकड़ लगभग 2,500 गुणवत्तायुक्त पौधों का रोपण संभव हुआ। नियमित पोषण प्रबंधन, सिंचाई एवं वैज्ञानिक देखभाल के कारण पौधों में शीघ्र फलधारण शुरू हुआ और बाग कुछ ही वर्षों में व्यावसायिक उत्पादन देने लगा।
*जिला उद्यान कार्यालय, बिहार सरकार का मिला आर्थिक सहयोग*
इस सफलता के पीछे उद्यान निदेशालय एवं जिला उद्यान कार्यालय, पश्चिम चम्पारण का महत्वपूर्ण योगदान भी रहा। ड्रैगन फ्रूट को राज्य में उच्च मूल्य वाली बागवानी फसल के रूप में बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित योजना के अंतर्गत श्री संजय कुमार को बाग स्थापना हेतु अनुदान (सब्सिडी) उपलब्ध कराया गया। इस वित्तीय सहायता से सीमेंट का पोल, ड्रिप सिंचाई प्रणाली तथा बाग की प्रारंभिक स्थापना पर होने वाले खर्च का बोझ काफी कम हुआ। सरकारी आर्थिक सहायता और कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक तकनीकी सहयोग के समन्वय ने इस परियोजना को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
*सिर्फ एक एकड़ से लाखों की आय*
श्री संजय कुमार का ड्रैगन फ्रूट बाग आज पूर्ण उत्पादन अवस्था में पहुँच चुका है। वर्तमान में लगभग 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र से प्रतिवर्ष लगभग 5 टन उच्च गुणवत्ता वाले ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन प्राप्त हो रहा है। प्रत्येक फल का औसत वजन लगभग 250 ग्राम है तथा बाजार में इसकी गुणवत्ता के कारण औसतन ₹250 प्रति किलोग्राम का मूल्य प्राप्त होता है।
ड्रैगन फ्रूट बाग की स्थापना पर प्रथम वर्ष में लगभग ₹3.80 लाख की लागत आई, जबकि बाग स्थापित हो जाने के बाद दूसरे वर्ष से इसका वार्षिक रखरखाव खर्च लगभग ₹1.10 लाख रह गया। आर्थिक विश्लेषण के अनुसार इस मॉडल का लाभ-लागत अनुपात 2.55 है, जो स्पष्ट करता है कि यह फसल पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक लाभकारी सिद्ध हो रही है।
*खेती ही नहीं, ग्रामीण रोजगार का भी बना माध्यम*
ड्रैगन फ्रूट की खेती से श्री संजय कुमार के परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। बढ़ी हुई आय के कारण वे आधुनिक कृषि उपकरणों, बेहतर पोषण प्रबंधन तथा अन्य कृषि नवाचारों में निवेश कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त बाग में तुड़ाई, छंटाई, ग्रेडिंग, पैकिंग और विपणन जैसे कार्यों के लिए स्थानीय स्तर पर श्रमिकों को रोजगार मिल रहा है, जिससे ग्रामीण युवाओं एवं महिलाओं को भी अतिरिक्त आय के अवसर प्राप्त हुए हैं।
*कृषि विज्ञान केंद्र और जिला उद्यान कार्यालय का समन्वित मॉडल*
विशेषज्ञों का मानना है कि श्री संजय कुमार की सफलता "तकनीकी मार्गदर्शन + सरकारी अनुदान + किसान की मेहनत" का उत्कृष्ट उदाहरण है। एक ओर कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर ने प्रशिक्षण, प्रदर्शन इकाई, पौध प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन, सिंचाई एवं रोग-कीट नियंत्रण जैसे विषयों पर निरंतर तकनीकी सहयोग प्रदान किया, वहीं दूसरी ओर बिहार सरकार के जिला उद्यान कार्यालय, पश्चिम चम्पारण बिहार, ने सरकारी योजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता उपलब्ध कराकर इस उद्यम को व्यवहारिक रूप से सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि आज श्री संजय कुमार का बाग पश्चिम चम्पारण ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार में ड्रैगन फ्रूट की वैज्ञानिक खेती का एक प्रदर्शन मॉडल (Model Orchard) बन चुका है।
*गुणवत्ता के कारण बाजार में अच्छी मांग*
ड्रैगन फ्रूट बाग में नियमित देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन के कारण उच्च गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन प्राप्त हुआ। फल की अच्छी गुणवत्ता के कारण बाजार में इसकी मांग बनी रही और किसान को आकर्षक मूल्य प्राप्त हुआ।
उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों में ड्रैगन फ्रूट की बढ़ती मांग किसानों के लिए फसल विविधीकरण का एक महत्वपूर्ण अवसर बन सकती है। बिहार सरकार भी ड्रैगन फ्रूट के क्षेत्र विस्तार को प्रोत्साहित करने के लिए विकास योजना चला रही है।
परिवार की आय बढ़ी, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बने
ड्रैगन फ्रूट की खेती से श्री संजय कुमार के परिवार की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बढ़ी हुई आय के कारण वे आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने और अपने कृषि उद्यम को और अधिक व्यवस्थित बनाने में सक्षम हुए हैं। यह बाग केवल किसान की आय का स्रोत नहीं बना, बल्कि इससे स्थानीय स्तर पर मौसमी रोजगार के अवसर भी सृजित हुए हैं।
फलों की तुड़ाई, छंटाई, ग्रेडिंग, पैकिंग, परिवहन और विपणन जैसे कार्यों में स्थानीय लोगों की भागीदारी से ग्रामीण क्षेत्र में अतिरिक्त रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार ड्रैगन फ्रूट की खेती ने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण आजीविका को भी सहयोग दिया है।
*कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर की रही महत्वपूर्ण भूमिका*
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर ने श्री संजय कुमार के ड्रैगन फ्रूट उद्यम की स्थापना से लेकर उसके सफल प्रबंधन तक महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग प्रदान किया।
केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किसान को ड्रैगन फ्रूट की वैज्ञानिक खेती के संबंध में प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई गई। केवीके में स्थापित प्रदर्शन इकाई का अवलोकन कर किसान को फसल की व्यावहारिक जानकारी प्राप्त हुई। इसके बाद बाग की स्थापना, पौधों की रोपाई, सहारा व्यवस्था, ड्रिप सिंचाई, पोषक तत्व प्रबंधन तथा बाग की नियमित देखभाल के संबंध में समय-समय पर तकनीकी परामर्श दिया गया।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने फसल से संबंधित विभिन्न समस्याओं के समाधान में भी किसान का मार्गदर्शन किया। वैज्ञानिक सलाह के आधार पर अपनाई गई आधुनिक कृषि तकनीकों ने बाग की सफल स्थापना और बेहतर उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
*आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बना बाग*
श्री संजय कुमार का ड्रैगन फ्रूट बाग अब पश्चिम चम्पारण के किसानों के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल के रूप में उभर रहा है। उनकी सफलता को देखकर आसपास के किसान भी उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों तथा ड्रैगन फ्रूट की वैज्ञानिक खेती के प्रति रुचि दिखा रहे हैं।
किसान के बाग का अवलोकन करने वाले लोगों को यह समझने का अवसर मिल रहा है कि उचित योजना, गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री, मजबूत सहारा व्यवस्था, ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से ड्रैगन फ्रूट की व्यावसायिक खेती को सफल बनाया जा सकता है।
*बिहार में फसल विविधीकरण की नई संभावना*
बिहार में कृषि विविधीकरण और किसानों की आय बढ़ाने के लिए उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों का विस्तार महत्वपूर्ण है। गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, तकनीकी मार्गदर्शन तथा बेहतर विपणन सुविधाओं के माध्यम से ड्रैगन फ्रूट की खेती को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जा सकता है।
ड्रैगन फ्रूट की खेती से किसानों को पारंपरिक फसलों पर निर्भरता कम करने, कृषि आय के नए स्रोत विकसित करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित करने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, इस खेती की सफलता के लिए बाग की स्थापना से पहले बाजार की उपलब्धता, गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री, सिंचाई व्यवस्था और तकनीकी सलाह पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
*सफलता की कहानी से किसानों के लिए संदेश*
श्री संजय कुमार की सफलता से यह स्पष्ट होता है कि खेती में परिवर्तन केवल नई फसल लगाने से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक योजना, सही तकनीक, नियमित देखभाल और उचित बाजार व्यवस्था से संभव होता है।
उनका अनुभव पश्चिम चम्पारण सहित बिहार के अन्य किसानों के लिए यह संदेश देता है कि वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर सीमित कृषि भूमि से भी बेहतर और अपेक्षाकृत स्थायी आय के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
*श्री संजय कुमार की यह उपलब्धि केवल एक किसान की आर्थिक सफलता नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कृषि, फसल विविधीकरण और ग्रामीण उद्यमिता का एक प्रेरक उदाहरण है।*
