एकता का समागम है कांवरिया पथ

बांका: सावन का महीना आते ही अजगैबीनाथ से बाबाधाम तक सम्पूर्ण कांवरिया पथ पर बोल बम की गूंज सुनाई देने लगती है. कंधों पर गंगाजल लेकर लाखों लाख कांवरिया सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं करते, बल्कि भारतीय समाज की एकता, सेवा, अनुशासन और सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं। कांवड़ यात्रा हमें यह सिखाती है कि जब व्यक्ति आस्था और भक्ति के मार्ग पर चलता है, तब जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति जैसी तमाम सीमाएं खुद पीछे छूट जाती हैं।यही कारण है कि यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि प्रेम, सहयोग, समानता और लोककल्याण की उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन गई है, जो समाज को जोड़ने और राष्ट्र को मजबूत बनाने का संदेश देती है । अजगैबीनाथ में गंगा से पवित्र गंगाजल उठाते ही श्रद्धालु का नाम, उसका कुल, उसकी आर्थिक हैसियत गौण हो जाती है, सड़क किनारे सेवा शिविर में एक करोड़पति व्यापारी का बेटा और एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा एक ही पंक्ति में बैठकर बराबरी से भोजन करते हैं। यह सदियों पुरानी सामाजिक दूरियों को पाटने का एक मौन प्रयास है और आस्था की स्वाभाविक शक्ति से यह भाव जन्म लेता है। इस पथ पर आने वाला हर व्यक्ति चाहे वह अमीर,गरीब,युवा,बुजुर्ग,महिला,पुरुष, दिव्यांग,किसी भी जाति विशेष का हो कोई जानकारी नहीं होकर सभी एक मंत्र बोलबम और एक नाम सिर्फ बम से पुकारे जाते हैं। इतना ही नहीं किसी थके हारे कांवरिया को सहारा देकर अपने लक्ष्य तक ले जाने में सहयोग करते हैं जिसमें जाति धर्म, कर्म नहीं देख कर सिर्फ बाबा भोले का भक्त जानकार मदद करते हैं।

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