बांका: कलश स्थापन से मूर्ति विसर्जन तक दस दिनों के इस दुर्गापूजा में ढोलिया का विशेष महत्व है।कलश स्थापन से रोजाना सुबह और शाम मंदिरों में ढोल की गूंज सुनाई पड़ती है मान्यता है कि आज के इस तरह तरह के वाद्य यंत्रों के बीच भी पुरानी परम्परा के अनुसार ढोलिया की गूंज से ही माता प्रसन्न होती हैं।सप्तमी के बाद हर विशेष पूजा पर हर दुर्गामंदिर में ढोल बजाने वाले अपने ढोल के साथ उपस्थित होकर पूजा में विशेष योगदान करते हैं। इस ढोलिया में मंदिर स्थापना के बाद से एक ही परिवार इस काम को आगे बढ़ कर करते हैं। जिसे पूजा समिति के एक सदस्य के रूप में मान्यता मिली हुई है। और उस परिवार को भी पूजा में नए वस्त्र और दक्षिणा भी समिति की ओर से सम्मान के साथ दिया जाता है।पुरानी दुर्गामंदिर,पांडेयडीह दुर्गामंदिर, बियाही दुर्गामंदिर में भी दस पूजा तक अलग अलग परिवार के ढोलिया परिवार अपना काम करते हैं।मंदिर के पूजक उपेंद्र पांडेय, और पांडेयडीह के रंजन पांडेय का कहना है कि माता को प्रसन्न करने के लिए पुरानी परम्परा के अनुसार आज भी ढोलिया का विशेष महत्व है।
ढोलिया से प्रसन्न होती है माता, एक ही परिवार निभाते हैं यह परंपरा।
byआमोद कुमार दुबे
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