नोटबन्दी के दौरान क्या डाकघरों से भी हुआ काले धन का खेल

बेतिया 11 सितम्बर।  भारत मे 2008 में जब मोदी सरकार ने पुराने 500 और 1000 के  नोटो को बंद किया और सभी बैंकिंग खातों को आधार से जोड़कर 20000 से ज्यादा की नगद लेन देन पर रोक लगा दिया ताकि काले धन पर रोक लगायी जा सके या उसे चिन्हित किया जा सके ,परंतु नोटबन्दी के दौरान ही बहुत से ऐसे वीडियो और सूचनाएं चर्चित रही जिसमे कुछ लोगो द्वारा अनैतिक लेन देन को बढ़ावा मिला। परंतु सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कुछ डाकघर भी काले धन के लेन देन को बढ़ावा दिये है। अगर सूत्रों की बात को माने तो नोटबन्दी के दौरान और उसके बाद एक ही नाम से बिस बिस हज़ार के टुकड़ो में लाखों लाख रुपये का भुगतान हुआ और ऐसे भुगतान लेने वालों की कोई  सही पहचान  शायद डाकघर के पास नही है। जबकि अगर हल्की सी भी जांच ईमानदारी से की जाय तो उसी नाम मे सरनेम जोड़कर बहुत सारे भुगतान कानूनी रूप से हुये है ऐसा करने के पीछे क्या मकसद है साफ समझ मे आता है और क्या ये बिना मिली भगत के हुई है । आखिर ऐसी अवैध निकाषी करने वाले उपभोक्ता कैसे नही डाकघर के अधिकारियो में नज़र में आये या वो कौन सा कारण था जो अधिकारियों ने आंख मूंद कर ऐसे भुगतान को अंजाम दिया अगर सूत्रों की बातों को सच मान लिया जाय तो कुछ चुनिंदा सेटिंगबाजो  द्वारा नगद निकाली गई रकम करोड़ो में हो सकती है । इन अवैध  निकाषी वालो के सेटिंग की बात करे तो ना ही भुगतान करने वाले अधिकारी न ही उच्च अधिकारी की पकड़ में ऐसे भुगतान नही आये जबकि यही अधिकारी अगर छोटे जमाकर्ताओं के नाम मे थोड़ी सी भी गलती नज़र आने  का इंतजार करते है और उनके साथ क्या क्या कानूनी उपाय करते है इसका अंदाजा जो इनके चक्कर मे फंसता है वही समझ सकता है।

 इस खबर की अगर जिला अधिकारी जाँच करें ताकि ऐसे लेन देन करने वालो का पता लगाया जा सके कहीं ऐसा तो नही की नही की इसी रकम का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में किया गया हो अगर ऐसा है तो ऐसे गलत भुगतान के जबाबदेह लोगो पर उचित कार्रवाई हो।


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