बांका-(रजौन): इस बार होली पर्व 28 29 मार्च को होने जा रहा है। होलिका दहन 28 की रात 12 बजे समय निर्धारित है। ग्रामीण इलाकों में बसंत पंचमी सरस्वती पूजा के दिन से ही गांवों के चौपालों पर फगुआ रसिकों व हुड़दंगियों की जमात लगनी शुरु हो जाती थीं।इस साल कोरोना महामारी का ख़ौफ शहर के अलावे ग्रामीण इलाके में भी इस कदर हावी हो गया है कि न तो चौपालें सज रही हैं और न ही फगुआ गीत पर ढोल,झाल,मंजीरे की गूंज सुनाई दे रहीं हैं।ग्रामीण इलाकों में पुराना रिवाज रहा करता था बसंत पंचमी या होलिका दहन के एक दो सप्ताह पहले से गांवों में होरियारों की चौपालें सज जाया करती थी।गांव के लोग चैता कटाई,गाय सानी-पानी निपटाकर शाम को चौपाल में आते और फगुआ (होली) गीत गा-बजाकर तन मन होरियारे लिया करते थे,लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं होता दिखाई दे रहा है।बड़े-बुजुर्ग होरियारों का कहना है कि भीड़ से कोरोना बीमारी फैलने का डर है,इसलिए घरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं।बसंत पंचमी के बाद गांव-देहात के दिन कोयल की कूंकूं- कूकऊ और रात फगुआ गीतों से गुलज़ार हुआ करती थी। करीब-करीब सभी गांवों में होली खेलने व गाने-बजाने वालों की एक अलग ही रंगत देखने को मिलती थीं।हास्य पसंद लोग ही नहीं, बल्कि गंभीर किस्म के लोग भी फगुआ के उमंग-मस्ती में डूब जाते थे।महीने भर गांव में फागुन होने का एहसास बरकरार रहता था।फिर होली के दो-तीन दिन होलिया की यह टोली घर-घर जाकर लोगों को फगुआ गीत गाते-सुनाते।गांव के छोटे-बड़े,बड़े-बुजुर्ग दिन-रात फगुआ की मस्ती में मस्त रहते।होलीका गीत गाने वालों का घर-घर किस्म-किस्म के पकवान से स्वागत भी किया जाता है। अक्सर यह परंपरा सदियों से प्रखंड के बरौनी,उपरामा, पुनसिया,सोहानी,परघड़ी,खैरा, विष्णुपुर आधे गांव में मौज मस्ती के साथ दो दो दिन तक होली का त्योहार धूमधाम से मनाने की पुरानी परंपरा चला आ रहा था।
वहीं,पिछले वर्ष सुल्लास मनाएं गए होली पर्व पर इस बार कोविड-19 का साया है।पिछले होली के बाद देश-विदेश सहित राज्य-जिला में कोरोना वायरस का फैलाव की वज़ह से आम से खास लोग कोरोना की मार झेलते-झेलते अब टीकाकरण के दौर से गुजर रहे हैं।इसी बीच अन्य जगहों के साथ-साथ बांका जिले में पुनः नए कोरोना पॉजिटिव केस मिलने से सतर्कता व दहशत का माहौल है।जिला प्रशासन ने कोविड-19 के होली पर्व मनाने की रूप-रेखा खींच चुके हैं।वहीं,डीजे आने से गुम हो गया पारंपरिक फाग का राग।
होली पर परंपरागत तौर पर गाए जाने वाले महाभारत के प्रसंग और अन्य गीतों के बोल नहीं सुनाई पड़ रहे हैं।इसके बदले गांव में डीजे,ब्लूटूथ पर फूहड़ भोजपूरी गीतों का शोर मचा रहता है।लोग इस गीतों से होली मनाने को मजबूर है।नये जमाने में युवाओं के पास वक्त नहीं है। पुरानी हर चीज बदल रही है। नवयुवक होली गाने में दिलचस्पी भी नहीं रखते है।ग्रामीण इलाकों में भी बहुत कम ही लोग होली गाने वाले बचे हैं। आने वाले कुछ दिनों में होली के गीत गाने की परंपरा मानो समाप्त ही हो जाएगी।
रिपोर्ट: कुमुद रंजन राव
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