"धरती माँ का सम्मान"

      


विश्व पृथ्वी दिवस प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाता है।पृथ्वी दिवस की स्थापना सन् 1970 में अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा एक पर्यावरण शिक्षा के रूप में की गयी, और आज इसे कई देशों में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। पृथ्वी दिवस की तारीख उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत ऋतु और दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद ऋतु का मौसम है। संयुक्त राष्ट्र में पृथ्वी दिवस को हर साल मार्च एक्विनोक्स (वर्ष का वह समय जब दिन और रात बराबर होते हैं) पर मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने के पीछे इसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील एवं जागरूक बनाना था। 

            अब प्रश्न ये उठता है सिर्फ एक दिन ही क्यों हम पृथ्वी के लिए सोचे? जिस पृथ्वी को हम माँ का दर्जा देते है, जिसने सम्पूर्ण मानव जाति, जीव जंतुओं, पेड़ पौधें, जल आदि को अपने गोद में शरण दे रखा है, उसी को आज हम दिन- रात प्रदूषित कर रहे है। पृथ्वी पर अक्सर उत्तरी ध्रुव की ठोस बर्फ़ का कई किलोमीटर तक पिघलना, सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओज़ोन परत में छेद होना, आये दिन भयंकर तूफ़ान, सुनामी, भूकम्प और भी कई प्राकृतिक आपदाओं का होना, इन सबके लिए मनुष्य ही ज़िम्मेदार हैं। ग्लोबल वार्मिग के रूप में जो आज हम सबके सामने हैं। अगर ऐसी आपदाएँ पृथ्वी पर ऐसे ही होती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी से जीव-जन्तु व वनस्पति का अस्तिव ही समाप्त हो जाएगा। मानव जाति, जीव-जन्तु अंधे हो जाएंगे, जीवन दूभर ही जायेगा। बढ़ती तापमान से लोगों की त्वचा झुलसने लगेगी, इतना ही नहीं  कैंसर रोग और विभिन्न रोगों से ग्रस्त रोगियों की संख्या बढ़ती जाएगी।  समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटवर्ती इलाके चपेट में आते  है अपने साथ कितनो की जान ले जाते है। एक तरफ दुनिया विकास की चरम सीमा को छूने का प्रयास कर रही है, तो दूसरी तरफ हरेक इंसान अपने क़दमों तले दुनिया की हर सुख सुविधा रखने के लिए अंधी दौड़ लगा रही है। इस भाग दौड़ में किसी को पर्यावरण की चिंता नहीं है। अगर यही स्थिति रही तो ऐशो आराम, सुविधापूर्ण जीवन जीने की चाह वही की वही धरी रह जायेगी क्योकि स्वयं के द्वारा फैलाई गई प्रदुषण के कारण इंसान शुद्ध वातावरण में साँस लेने के लिए तरस जायेगा। आज मानव जाति ने इतना विकास किया कि अब चाँद पर कदम रखना सपना नहीं रहा। लेकिन अब वह दिन दूर नहीं जब धरती पर चैन की शुद्ध साँस लेना सपना जरुर हो जायेगा। हमने खुद ही अपने पर्यावरण और पृथ्वी को नजर-अंदाज किया है और जिसका दुष्परिणाम ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। ग्लोबल वार्मिग, प्रदुषण आदि संकटों से पृथ्वी ग्रह इतना प्रभावित हो रहा है कि आज तेजी से जल संकट उत्पन्न हो रहा है। यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं, जब पृथ्वी पर शुद्ध जल, शुद्ध हवा के लिए हाहाकार मच जायेगा। हरियाली की चाँदर ओढ़ने वाली, अन्न उपजाने वाली, धरती माँ कहलाने वाली यह धरती माँ, सिर्फ कल्पनाओं में ही हरी भरी रहेगी।

          पृथ्वी के पर्यावरण को बचाने के लिए अगर हम बहुत कुछ नहीं कर सकते है तो इतना तो जरूर करें कि  प्लास्टिक, पॉलीथिन एवं अन्य प्रदुषण फ़ैलाने वाले चीजों का इस्तेमाल को बंद करे और रिसाइकल प्रक्रिया को ज्यादा बढ़ावा दें। क्योकि जितनी ज्यादा खराब चीजें रिसाइकल होगी उतना ज्यादा पृथ्वी का कूड़ा कचरा कम होगा। इसके लिए जरुरत है हम खुद जागरूक हो एवं अन्य लोगों को जागरूक कर पृथ्वी एवं पर्यावरण को प्रदुषण से बचाये। प्रत्येक नागरिक अपनी जिम्मेवारी समझे। शहरों में पृथ्वी को दूषित करने वाले, प्रदूषण फ़ैलाने में महती भूमिका निभाने वाले कल कारखानों के लिए कड़े एवं सख्त नियम बने, जिससे प्रदुषण को रोका जा सके। सरकार के साथ साथ प्रत्येक आम आदमी पृथ्वी पर्यावरण सुरक्षा को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेवारी समझे और यह प्रयास करे कि यह पृथ्वी सदा सर्वदा जीवनदायी एवं हरी - भरी ही बनी रहे। सरकार, राजनेता, शिक्षाविद्, व्यवसायी एवं बुद्धिजीवी वर्ग के लोग समय - समय पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करे जिससे ग्रामीण जनता, छात्रगण एवं अन्य लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता आये। यह कार्य न ही कठिन है न ही असंभव है। जरुरत है अपनी सोच को सकारात्मक रख खुद कदम बढ़ाने की। कोई साथ न आये तब भी 'एकला चलो'।  एक न एक दिन खुद ब खुद एक लंबा कारवां पीछे आ ही जायेगा अपनी धरती माँ की रक्षा के लिए।

  " आइये हम कदम बढ़ाये, पृथ्वी को प्रदुषण से बचाये"।          

                                 


                 मेरी आडलीन ( शिक्षिका)

        राजकीय+2 उच्च विद्यालय कुमारबाग

               प० चम्पारण

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