"कोविड अनुरूप आचरण है लॉक डाउन का विकल्प" : प्रो. रामदेव भारद्वाज

     प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलपति, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल ।

आज संपूर्ण राष्ट्र का जिस वेदना और भयावहता के दौर से साक्षात हो रहा है वह हमें विनाश के विविध स्वरूपों के चित्रों को रेखांकित कर रहा है। यह सब इसलिए है कि या तो ईश्वर ने भृकुटियाँ तिरछी कर ली है और प्रकृति तांडव कर रही है अथवा हमने स्वयमेव ही इन दृश्यों को देखने के लिए प्रकृति एवं परिस्थितियों का निर्माण किया है। अभी कुछ कहने और विश्लेषण का उपयुक्त समय नहीं है परंतु यह तो सत्य है कि इन भष्मासुरों और इन रक्तबीजों का विनाश हम धैर्य के साथ, विश्वास के सहारे, कठोर अनुशासन एवं आत्मानुशासन के द्वारा ही कर सकते हैं। कोई और हमें हमारे आचरणों को परिमार्जित नहीं कर सकता जब तक हम स्वयं न चाहें। आज हम सभी स्तब्ध हैं, पर किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं। प्रतिकूलता और भयावहता से निवृत्ति का मार्ग तो है यदि हम उस पर चलें, अथवा चलना चाहें। यह समय गलतियों को खोजने, विश्लेषण करने, दोषों का आरोपण करने, दोषी को खोजने अथवा चर्चा-परिचर्चा का नहीं है यह तो कुछ समय बाद भी किया जा सकता है परंतु अभी तो वाद-प्रतिवाद से ऊपर उठकर एक विचार, एकभाव, एक दृष्टि, एक समान कृत्य और एक नेतृत्‍व पर विश्वास करके कोरोना को पराजित करने की दिशा में सक्रिय होने का है तभी हम प्रकृति के तांडव और मृत्यु के जंजाल से ऊपर उभर पाएंगे।

 कोरोना संकट और कोरोना से विमुक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में हमें क्या करना है और क्या नहीं? इस दृष्टि से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 अप्रैल 2021 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए जो रूपरेखा प्रस्तुत की वह विचारणीय औऱ अनुकरणीय है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस बार कोरोना का स्वरूप विकराल है, भयावह है, अप्रत्याशित तूफान की तरह है हम सब थरथरा रहे हैं, यह तो प्रकृति के तांडव से कम नहीं। व्यक्तियों ने असहनीय पीड़ा सही है, सह रहे हैं उसका मुझे भी अहसास है। कोरोना वायरस से देश में स्थिति खराब है। कोरोना की इस लहर ने कहर मचा दिया है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि सरकार किस तरह इस संकट से उभरने के लिए लगी हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि संक्रमण से बचने के लिए संपूर्ण लॉकडाउन लगा देना चाहिए। परंतु लॉकडाउन ही एकमात्र विकल्प नहीं है, यही अंतिम विकल्प नहीं है और भी अनेक साधन है जहां से कोरोना से मुक्ति का मार्ग जाता है। उन सभी का सघन तरीकों से उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने राज्यों से अनुरोध किया कि लॉकडाउन को अंतिम विकल्प के रूप में ही इस्तेमाल किया जाए।

 प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन अत्यधिक व्यावहारिक और विश्वास के परिपूर्ण था। उन्होंने शासन स्तर पर जो खामियाँ हैं उन्हें स्वीकार किया। कमियों को छिपाया नहीं, ऑक्सीजन, बिस्तर, दवाइयों की कमी को स्वीकारा और इनकी प्रतिपूर्ति के लिए किए जा रहे प्रयासों का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन सर्वाधिक पारदर्शी रहा। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था की खामियों को भी खुले मन से स्वीकार किया। मोदी ने कहा कि इच्छाशक्ति एवं जनभागीदारी ये ऐसे दो मंत्र हैं जिनसे कोरोना को पराजित किया जा सकता है। यह तो हम सभी समझते हैं कि अकेले सरकार इस लड़ाई को नहीं लड़ सकती। जब तक जन चेतना और जन सहयोग नहीं होगा तब तक शासकीय प्रयास काफी नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि धैर्य रखो विश्वास में बड़ी ताकत है। "कोरोना के खिलाफ़ देश आज फिर से जिस बड़ी लड़ाई को लड़ रहा है, कुछ सप्ताह पहले तक स्थितियां संभली हुई थीं और फिर यह कोरोना की दूसरी वेव जो तूफान बनकर आई है सर्वाधिक प्राणघातक है। लाशों के ढेर लग रहे हैं, घर परिवार तबाह हो रहे हैं, चारों ओर रुदन और क्रंदन है। जो पीड़ा आपने सही है, जो पीड़ा आप सह रहे हैं, उसका मुझे अहसास है"। "जिन लोगों ने बीते दिनों में अपनों को खोया है, उन सभी देशवासियों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि परिवार के एक सदस्य के रूप में, मैं आपके दुःख में शामिल हूँ। चुनौती बड़ी है लेकिन हमें मिलकर अपने संकल्प को प्राप्त करना है। हौसले और तैयारी के साथ इसको पार करना है"।

 देश में ऑक्सीजन की कमी को स्वीकारते हुए कहा कि अनायास ही आवश्यकता ज्यादा बढ़ी है। इस विषय पर तेजी से और पूरी संवेदनशीलता के साथ काम किया जा रहा है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, प्राइवेट सेक्टर, सभी की पूरी कोशिश है कि हर जरूरतमंद को ऑक्सीजन मिले"। "ऑक्सीजन प्रॉडक्शन और सप्लाई को बढ़ाने के लिए भी कई स्तरों पर उपाय किए जा रहे हैं। राज्यों में नए ऑक्सीजन प्लांट्स हों, एक लाख नए सिलेंडर पहुंचाने हों, औद्योगिक इकाइयों में इस्तेमाल हो रही ऑक्सीजन का मेडिकल में इस्तेमाल हो, ऑक्सीजन रेल में हो, हर प्रयास किया जा रहा है।"

 प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय वैज्ञानिकों की सराहना की और कहा कि "हमारे वैज्ञानिकों ने दिन-रात एक करके बहुत कम समय में देशवासियों के लिए वैक्सीन विकसित की है। आज दुनिया की सबसे सस्ती वैक्सीन भारत में है। भारत की कोल्ड चेन व्यवस्था के अनुकूल वैक्सीन हमारे पास है"। यह एक टीम प्रयास है जिसके कारण हमारा भारत,  स्वदेश निर्मित वैक्सीन के साथ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू कर पाया। टीकाकरण के पहले चरण से ही गति के साथ ही इस बात पर जोर दिया गया कि ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों तक, जरूरतमंद लोगों तक वैक्सीन पहुंचे"। वैक्सीन के उत्पाद, वितरण, प्रक्रिया और वैक्सीनेशन के संबंध में मोदी की नीति स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि "दुनिया में सबसे तेजी से भारत में पहले 10 करोड़, फिर 11 करोड़ और अब 12 करोड़ व्यक्तियों को वैक्सीनेशन किया गया। एक मई से अब 18 वर्ष के ऊपर के किसी भी व्यक्ति को वैक्सीनेट किया जा सकेगा। अब भारत में जो वैक्सीन बनेगी, उसका आधा हिस्सा सीधे राज्यों और अस्पतालों को भी मिलेगा।" "हम सभी का प्रयास, जीवन बचाने के लिए तो है ही, प्रयास यह भी है कि आर्थिक गतिविधियां और आजीविका, कम से कम प्रभावित हों। वैक्सीनेशन को 18 वर्ष की आयु के ऊपर के लोगों के लिए खोलने से शहरों में जो हमारी वर्कफोर्स है, उसे तेजी से वैक्सीन उपलब्ध होगी"।

 प्रधानमंत्री मोदी ने भावुक हृदय से आग्रह किया कि "मेरा राज्य प्रशासनों से आग्रह है कि वे श्रमिकों में  भरोसा जगाए रखें, उनसे आग्रह करें कि वे जहां हैं, वहीं रहें। राज्यों द्वारा दिया गया यह भरोसा उनकी बहुत मदद करेगा कि वे जिस शहर में हैं वहीं पर अगले कुछ दिनों में वैक्सीन भी लगेगी और उनका काम भी बंद नहीं होगा"। युवा साथियों से अनुरोध करते हुए आह्वान किया कि युवा अपनी-अपनी सोसायटी में, मोहल्ले में, अपार्टमेंट्स में छोटी- छोटी कमेटियाँ बनाकर कोविड अनुशासन का पालन करवाने में मदद करें। हम ऐसा करेंगे तो सरकारों को न कंटेनमेंट ज़ोन बनाने की ज़रूरत पड़ेगी, न कर्फ़्यू लगाने की, न लॉकडाउन लगाने की"। विशेषतौर पर बालकों से कहा कि घर में ऐसा माहौल बनाएं कि बिना काम, बिना कारण घर के लोग, घर से बाहर न निकलें। आपकी जिद बहुत बड़ा परिणाम ला सकती है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से अनुरोध किया कि "आज की स्थिति में हमें देश को लॉकडाउन से बचाना है। राज्य लॉकडाउन को अंतिम विकल्प के रूप में ही इस्तेमाल करें। लॉकडाउन से बचने का पूरा प्रयास करना और माइक्रो कन्टेनमेंट जोन पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। आज इस विपदा के समय में इस संकट से कोई एक सरकार हमें उभार नहीं सकती। सरकार नीतियाँ बना सकती हैं अपने कार्यकारी शक्तियों के माध्यम से लागू करने पर बल दे सकती है पर करना तो हमें ही है।


आओ कुछ संकल्प लें-


(1) स्वयं के साथ-साथ अन्य सबका जीवन बचाएंगे (2) श्रमिकों को जहां है वहीं पर रहने का आग्रह करेंगे (3)  राज्य केंद्र के साथ मिलकर सकारात्मक भूमिका निभाएंगे (4) कोरोना से निपटने में डॉक्टर की विशेषज्ञता की सराहना करेंगे (5) डॉक्टरों और प्रभावित व्यक्तियों को प्रोत्साहित करेंगे (6) अनुशासन और धैर्य से कोरोना को हराएंगे (7) दवाइयां लेंगे और कड़ाई के साथ कोविड गाइडलाइंस का पालन भी करेंगे (8) और करवाएंगे (9) दवाइयों के उत्पादन को बढ़ाएंगे (10) राज्यों में छोटे-छोटे कन्टेनमेंट जोन बनाएंगे (11) स्थानीय टोलियों का गठन करेंगे (12) अति आवश्यक होगा तभी घर से बाहर निकलेंगे (13) औद्योगिक क्षेत्रों में उपयोग की ऑक्सीजन का मेडिकल क्षेत्र में उपयोग करेंगे (14) कोविड के बचाव के अनुकूल ही आचरण करेंगे (15) जान तो बचाएंगे ही और आजीविका भी बचाएंगे (16) जन भागीदारी की ताकत से ही कोरोना को समाप्त करेंगे (17) संकट की इस घड़ी में सभी देशवासियों को आगे आकर अपने को सुरक्षित रखते हुए दूसरों को भी दिशा बोध कराएंगे (18) कमियों को छिपाएंगे नहीं (19) लापरवाही नहीं करेंगे, बिना मास्क के बाहर नहीं निकलेंगे (20) "सेवा परमो धर्म" के मंत्र पर चलते हुए डॉक्टर, नर्स, हेल्थ वर्कर, सुरक्षाकर्मियों की निःस्वार्थ सेवा करेंगे (21) कोरोना अभी गया नहीं, खतरा अभी टला नहीं इस मंत्र को ध्यान में रखेंगे (22) मानवता को बचाने के लिए युद्ध स्तर पर सहभाग करेंगे, सक्रिय रहेंगे। (23) जैसे कोरोना वायरस ने स्वयं को म्यूटेड किया है और स्वरूप, स्वभाव एवं प्रभाव बदलकर पुनः विकराल आकर में आया है उसी तरह हम भी अपनी जीवन शैली बदलेंगे, रहन-सहन, खान-पान और स्वभाव परिवर्तित कर कोरोना को नष्ट करेंगे।


अंत में यह स्मरण रखें


संवादों की श्रृंखला में मौन संवाद की परंपरा ही अंतिम सत्य है, परंतु इसे न तो कोई किसी को समझा सकता और ना ही स्वयं समझ सकता है। यदि समझ में आ जाए तो यह घटाटोप, यह हाहाकार, शिथिलता और समाधान के दृश्यों में रूपांतरित हो सकता है। आज कोरोना काल की विभीषिका में संवेदनाओं का मौन हो जाना मानव सभ्यताओं के भीषण ताण्डवों में शिखर पर है। यहां शब्द ने अपना स्वरूप और स्वभाव परिवर्तित कर लिया है। वेदना में वेदना नहीं रही, संवेदना संवेदनशील रहित हो गई, करुणा का भाव निष्ठुर हो गया है। मनुष्य एकाकी, नितांत एकाकी अनुभूतित स्तब्ध है। 

 मनुष्य भयभीत है, कहने को तो भय मन का एक विकार है। परंतु आज के भय के कारण टूट चुका है और धीरे-धीरे उसका विश्वास ढह रहा है, उसका व्यक्तित्व भी ढह रहा है वह शिथिल और निष्क्रिय हो रहा है। अब मनुष्य को न तो मृत्यु का भय रह गया है और न जीने की लालसा.... अनगिनत लाशें और लाशों के ढेर पर संयम और विश्वास भी धोखा दे रहा है, लाशों को जलाने के लिए न तो स्थान है और न सामग्रियां, दफनाने को जगह नहीं....हम इसके साक्षी है....युद्ध में तो शत्रु निश्चित है, दिखता है, लक्ष्य भेदना सरल है परंतु यहां तो शत्रु अदृश्य है? इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य  ....एक मार्ग है अपने आपको बदलें.... क्या करें, किससे पूछें.... पूछ कर भी क्या करेंगे?  अपने आप में आज रामचरित मानस में वर्णित शिक्षाप्रद बातें और चेतावनियों को आदर्श मानकर जिम्मेदारियों को और भी सतर्कतापूर्वक जीवन का अभिन्न अंग मानकर आचरण करने की आवश्यकता है। तुलसीदास जी ने लिखा है कि -"रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि" अर्थात् आग, शत्रु, पाप यानी गलती और बीमारी को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। जब तक इनका पूरा इलाज ना हो जाए, इन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसलिए स्मरण रखना होगा कि कोरोना को छोटा नहीं समझें, पाप अर्थात् गलती न करें न दोहराएं, कोरोना को परास्त करने के लिए अपने को बदलें, अपना स्वभाव और आचरण बदलें, अर्थात् घर पर रहें, बाहर कम निकलें, COVID Appropriate Behaviours करें, मास्क लगाएं, यही औषधि है, यही संजीवनी है, यही जीवन के लिए अमृत है।

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