बांका (रजौन):हिंदी महीना के वैशाख शुरू होने के साथ सत्तूआनी का महापर्व मनाया जाता है।बिहार सहित बांका जिले में यह पर्व हरेक प्रखंड के घर-घर मनाया जाता है।मूल रूप से यह पर्व किसानों का है,जो भारतीय संस्कृति से सनी है,ताकि परम्परा जिंदा रहें और इस पर्व के बहाने हमारे पूर्वजों ने गर्मी के मौसम के साथ सामंजस्य बैठाने की ठोस उक्ति ढूंढ लीं थीं।हालांकि भारत में कई क्षेत्रों में इस पर्व को अलग-अलग नाम व विधी-विधान के साथ मानने की परंपरा रही है। इस दिन लोग अपने पूजा घर में मिट्टी या पीतल के घड़े में आम का पल्लव निश्चित स्थापित करते हैं।इस दिन विशेष रूप से सत्तू खाने की परंपरा हैं,जो समय के साथ सम्पूर्ण भारत में बिहारी खाना के रूप में प्रसिद्ध हो गया है।इस बार बुधवार को सत्तुआनी(बिसुआ) का महापर्व मनाया गया।करीब-करीब सभी घरों की महिलाओं ने सुबह-सुबह नहा-धोकर आम के पल्लव(पत्ता लगे डंठल में आम के छोटे-छोटे फल) मिट्टी के घड़े में डाले और विधी-विधान के साथ पूजा अर्चना कीं।वहीं,कुल देवी-देवताओं को सत्तू का भोग लगायी,और घर-परिवार की खुशियों की मन्नतें मांगीं।फिर घर के सभी सदस्यों ने सत्तू,आम के टिकोला,नमक,हरी मिर्च,कच्चा प्याज व आचार का सेवन किया।फिर रात्रि में चिकनपुरी,पुआ,मालपुआ,दहीबड़ा व सब्जी जैसे पकवान का लुफ़्त उठाया।वहीं,इस पर्व के उपलक्ष्य पर रात्रि में अधिकांश गांव में भरथरी(भर्तहरि)का कार्यक्रम होता है।इस बार जिला प्रशासन के निर्देश के आलोक में कोविड-19 के गाइडलाइंस के पालन की वज़ह से भरथरी कार्यक्रम पाबंदी लगाई गई है।विदित ही कि सतुआन पर्व निपटते रुके मंगल कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। हिंदू धर्मलंबियां के लिए सतुआन संक्रांति का काफी महत्व है।इस दिन को खरमास समाप्ति और मंगल कार्य की शुरुआत का दिन तो मनाते ही हैं,पवित्र नदियों में स्नान एवं दान पुण्य का भी इसे बड़ा पर्व माना जाता है।सतुवा(सत्तू)के सेवन की परंपरा भी यहां सदियों से कायम है।सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ संक्रांति का पर्व शुरू हो जाता है। पूरे दिन नदियों,तलाबों में स्नान एवं दान पुण्य किया जाता है बताते चले कि प्रतिवर्ष चैत्र माह में खरमास लगता है और इसकी समाप्ति के दिन यानी सूर्य के मेष संक्रांति में प्रवेश के दिन सतुवा संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं को मानने वाले लोग आम के फल टिकोला सेवन की भी शुरुआत इसी दिन करते हैं।प्रतिवर्ष सूर्य जब मीन राशि छोड़कर मेष राशि में प्रवेश करते है,तब इस के उपलक्ष्य में यह त्यौहार मनाया जाता है।यह भी मान्यता है कि सूर्य जब सूर्य मीन राशि को त्याग कर मेष राशि में प्रवेश करते है,तो उसके पुण्य काल में सूर्य और चंद्रमा की रस्मों से अमृतधारा की वर्षा होती है,जो आरोग्य वर्धक होता है,इसलिए इस दिन लोग बासी खाना भी खाते हैं।
रिपोर्ट :कुमुद रंजन राव