रजौन (बांका): प्रखंड क्षेत्र के नवादा थाना अंतर्गत खरवा गांव स्थित महामाया दुर्गा मंदिर का इतिहास 150 वर्ष पुराना है। रजौन से 12 किलोमीटर दूर स्थित एक ऐसा मंदिर है, जिसका इतिहास काफी पौराणिक है। बताया जाता है कि खरवा गांव में करीब 1870 ई. में भयंकर महामारी बीमारी का महाप्रकोप फैलने से एक-एक कर कई लोग मौत के गाल में समाने लगे। इसी दौरान गांव के बाबू पलकधारी प्रसाद सिंह को स्वप्न में आदेश मिला की गांव में मंदिर का निर्माण कर बलि प्रथा के साथ मेरी पूजा अर्चना निष्ठा पूर्वक करोगे तो लोगों को महामारी से मुक्ति मिलेगी। स्वप्न के अनुसार बाबू पलक धारी प्रसाद सिंह के छोटे भाई बाबू छत्रधारी प्रसाद सिंह ने महामाया दुर्गा मंदिर निर्माण कराकर 1870 ईo में प्रतिमा स्थापित कर दुर्गा पूजा समारोह मनाने की शुरुआत की। तब लोगों ने मां की आराधना कर इस भीषण प्रकोप से निजात दिलाने की कामना की और तब से लेकर आज तक इस गांव में उसके बाद कभी महामारी का प्रकोप नहीं हुआ और लोग सुखमय जिंदगी व्यक्त कर रहे हैं। महामारी के नाम पर ही इस मंदिर का नाम महामाया दुर्गा मंदिर रखा गया था। उसके बाद ग्रामीण काफी हर्षोल्लास के साथ विधि विधानपूर्वक दुर्गा पूजा मनाते हैं। इस वर्ष कोरोना काल और विधानसभा चुनाव के कारण दुर्गा पूजा का रंग फीका हो गया। महामाया दुर्गा मंदिर खरवा इस साल 150 वां वर्ष पूरा किया। पिछले 150 साल से महामाया दुर्गा मंदिर में विधिवत मां की प्रतिस्थापित कर काफी नियम व निष्ठा के साथ पूजा की जाती है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब इस गांव में महामारी ने कोहराम मचाना शुरू किया तो गांव के पलकधारी प्रसाद सिंह और छत्रधारी सिंह दोनों भाइयों ने ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया। तब से आज तक कभी वह बीमारी फिर से इस इलाके में नहीं आई। जो श्रद्धालु नियम और निष्ठा के साथ यहां मां की आराधना करते हैं, मां उनकी मनोकामना पूरा करती है।मेढ़पति परिवार विजय प्रसाद सिंह, अजय सिंह, सुनील सिंह, राजू सिंह, आशीष सिंह बताते हैं कि 1870 ई. से ही यहां पाठा की बलि दी जाती है। यहां लोग दूर-दराज से आकर पूजा अर्चना करते हैं।
रिपोर्ट: केआर राव