रजौन (बांक):प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत चांदन नदी के पूर्वी तट रुपसा गांव में करीब 400 साल पुराना मां दुर्गा मंदिर लोगों की आस्था का प्रतीक बना हुआ है। यहां पर वर्षों से भव्य मेला का आयोजन होते आ रहा है। यहां भक्त दूर-दराज से मां दुर्गा का दर्शन के लिए आते हैं। यहां के मंदिर के प्रति लोगों में अटूट आस्था है। लोगों की मनोकामना यहां पूर्ण होती है। इस मंदिर का महत्व त्योहारों में बहुत अधिक बढ़ जाता है। उक्त जगह 400 वर्ष पूर्व स्थापित दुर्गा मंदिर गांव के ही बंगाली कायस्थ परिवार आत्मज हाथी लाल दत्त के वंशज मेढ़पति ओमित कुमार दत्त के द्वारा आयोजित कराई जाती है, शरदकालीन भगवती पूजन की शुरुआत यहाँ बोधन कलश स्थापना से ही होती चली आ रही है, उस दिन माता का आगमन के समय कुबेर देव के नौ कौड़ियों को लुटाया जाता है और एक क्षाग (बकरे) बलि प्रदान की जाती है। उस दिन से ही मंदिर में चंडी पाठ आरंभ हो जाता है।रुपसा गांव के ग्रामीणों ने बताया कि वर्तमान वर्ष में 30 सितंबर से बोधन कलश स्थापना के साथ बंगाली दुर्गा पूजा का शुभारंभ हो गया है, हालांकि इस वर्ष में पांच एवं छः पूजा एक ही दिन है। लोगों के बीच उत्साह बरकरार है। उनलोगों ने यह भी बताया कि यहाँ डाक साज पहनाने की परंपरा पूर्वजों से ही चली आ रही है। चतुर्थी पूजन में माता को नदी से आह्वान करा लाया जाता है और उस दिन भी कौड़ियां लुटाई जाती है, पुनः छह पूजा को सांध्य समय गंधाधिवास पूजा का आयोजन होता है। सप्तमी को संध्या समय मेढ़ पर मेढ़ चढ़ाने की परंपरा है उसके बाद माता का आह्वान मनपत्रिका स्नान बगल के चांदन नदी में करवाया जाता है और सात कौड़ियां लुटाई जाती है और एक काले बकरे की बलि दी जाती है। अष्टमी को प्रातः से माता का कपाट भक्तों के लिए खोल दी जाती है। इस बांग्ला पद्धति से किए जाने वाले पूजन को बहुत ही नियम निष्ठा से किया जाता है। पंडित सुबोध मिश्रा का कहना है कि अष्टमी के दिन संधि पूजा किया जाता है और संध्या के समय संधि बलि प्रदान की भी परंपरा चलती चली आ रही है। नवमी के दिन सभी बंगाली समुदाय से लोग मंदिर में पूर्वज से ही अखंड दीप प्रज्वलित करते है और माता को बलि प्रदान करते हैं। यहाँ की खास बात यह भी है कि नवमी के दिन मुराद पूरी होने से भक्त मुकुट चढ़ाते है और अपने मन्नतें पूरी होने का आशीर्वाद प्राप्त करते है। यहाँ नवमी के दिन काफी संख्या में मुंडन संस्कार का भी आयोजन होता है। दशमी के दिन प्रातः दही-चुड़ा का भोग कुंवारी कन्याओं को करवाया जाता है और सांध्य को बंगाली कायस्थ समुदाय के महिलाएं सिंदूर की होली खेलकर विजयादशमी मानती है, फिर मूर्ति को कंधे पर लेकर समस्त ग्रामीणों के सहयोग से गांव भ्रमण करते हुए चांदन नदी में विसर्जित कर दी जाती है और सभी ग्रामीण आपस में गले मिलाते है। विसर्जन उपरांत मंदिर में अपराजिता पूजा का आयोजन होता है, जिसमें की हल्दी, जयंती आदि प्रसाद के रूप में ग्रामीणों को दिया जाता है।
रिपोर्ट :केआर राव