बांका(चांदन) : प्रखंड मुख्यालय स्थित 500 वर्ष पुरानी दुर्गा मंदिर सिद्धपीठ के रूप में चर्चित है। यह मंदिर देवघर, बांका पक्की सड़क और ट्रेन रूट से भी पहुंचा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के समीप स्थित यह दुर्गा मंदिर जमींदार उदित नारायण टिकैत के पूर्वजों द्वारा पुत्र प्राप्ति की कामना को लेकर स्थापना की गई थी।
मंदिर का इतिहास
लोग बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना के बाद यहां नर बलि दी जाती थी। नरबलि के बाद जंगलों के बीच नाच और गाना का कार्यक्रम होता था। मंदिर में नरबलि के बाद कुछ दिनों तक भैंसे की बलि भी दी गई। एक भक्त द्वारा इसका विरोध करने पर इसे बंद कर दिया गया। तब से यहां करीब 1000 बकरे की बलि दी जाती है।
मंदिर की विशेषता
इस मंदिर में पूजा बंगला पद्धति से होती है।
इस मंदिर को सिद्धिपीठ के रूप में मान्यता है।
यहां हर भक्तों की मनोकामना पूरी होती है।
माता के डाक के लिए कई बर्ष तक अग्रिम आवेदन जमा होता है।
यहां दंड देने की काफी पुरानी परंपरा आज भी चल रही है।
प्रथम पूजा की बलि का प्रसाद पाने के लिए भक्त लालाइत रहते है।
यहां की बेलभरणी पूजा सबसे महत्वपूर्ण होती है।जिसमे महिलाएं गीत से माता को रोजाना प्रसन्न करती है।
क्या कहते हैं पुरोहित
मंदिर के आचार्य लालमोहन पांडे और पूजक उपेंद्र पांडे का कहना है कि यहां सिद्धि पीठ की पूजा बंगला पद्धति से होती है। इस मंदििर से कोई भी भक्त निराश होकर नहीं जाता है सभीी भक्तों की सभी मनोकामना पूरी होती है