दीपोत्सव को लेकर कुंभकारों के चाक की तेज हुई रफ्तार

बांका:दीपावली पर्व के निकट आते ही लोग अपने घरों, दुकानों आदि की साफ-सफाई में जोरशोर से जुट गए हैं। वहीं प्रखंड क्षेत्र के कुंभकारों के गांवों में मिट्टी के दीये, ढिबरी, कलश, धुपौरी, कपटी, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति आदि बनाने का काम तेज हो गया है। दीपावली आते-आते मिट्टी के दीपक आदि की मांग बढ़ जाती है। जिससे इस धंधे से जुड़े परिवारों को आजीविका के क्षेत्र में काफी फायदा होता है। पिछले कुछ वर्षों से बाजार में चायनीज लाइटों के अधिक बिक्री एवं प्रचलन से कुंभकारों के रोजगार पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। हालांकि, गत कुछ वर्षों से कई राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा लगातार चाइनीज लाइटों आदि का बहिष्कार के ऐलान से काफी असर हुआ है और मिट्टी के दीये की मांग फिर से बढ़ी है। इस वर्ष भी कुछ अधिक मिट्टी के दीये बिकने के आसार हैं. जिससे कुंभकारों को अपने पुश्तैनी धंधे के क्षेत्र में उम्मीदों की नई किरण दिखती नजर आ रही है। वहीं, महंगाई के इस दौर में भी इस वर्ष दीपावली में मिट्टी के दीये सवा सौ से डेढ़ सौ रुपए प्रति सैकड़ा तक बिकने की उम्मीद जताई जा रही है। रजौन प्रखंड में मिट्टी का बर्तन, खिलौने आदि बनाने का काम बामदेव, लकड़ा, दौना, झिकटा, भदवा, लश्करी, नवादा, मिर्जापुर, खैरा, कुरुमचक, चकसफिया, राजावर, खुशहालपुर, डरपा, सिंहनान, चांदन नदी स्थित नवादा-गोपालपुर, जगन्नाथपुर आदि गांव के कुंभकार अपने पुश्तैनी धंधे में जुटे हुए हैं। रजौन प्रखंड के बामदेव बाजार के कुंभकार छबीलाल पंडित, सुबोध पंडित ने बताया हम लोगों का चाक पर मिट्टी के बर्तन आदि बनाना पुश्तैनी धंधा है। छविलाल पंडित बताते हैं कि गांव सहित आसपास में पंक एवं करार मिट्टी नहीं मिलने पर धनकुंड के सैनचक एवं बैजाडीह से मिट्टी लाकर दीया बनाते हैं। नवादा बाजार के कुंभकार रामदेव पंडित, शंकर पंडित, अशोक पंडित आदि बताते हैं कि इस आधुनिक युग में चाइना सामानों के अधिकांश प्रचलन से कुंभकारों के पुश्तैनी धंधा काफी परेशानियों से घिर गया है। कुंभकार बताते हैं कि तैयार किए गए एक गोला की मिट्टी से चाक पर आधा घंटे में 50 से 60 ढिबरी और दीया बनता है, जिसे बाजार में चार सौ रुपए सैकड़ा के हिसाब से बिक्री करते हैं। एक ढिबरी और मिट्टी के दीये बनाने में दो से तीन रुपया लागत आता है। पहले ज्यादा बिकता था तो मुनाफा ज्यादा होता था पर अब किसी तरह से कम मुनाफे में ही पुश्तैनी धंधा से जीवन यापन कर रहे हैं। कुंभकारों ने यह भी बताया कि मेहनत के हिसाब से इसमें आमदनी नहीं है, लेकिन घर में बेरोजगार बैठने से अच्छा है अपने पुश्तैनी रोजगार को करते रहना, इससे अधिक न सही कुछ ना कुछ आमदनी हो ही जाती है।
रिपोर्ट:केआर राव 

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