गांधीवाद समय की मांग .......!

भारतीय राजनीति में दो ऐसे नाम है ,जिन्हें हर कोई जब चाहे ,जहाँ चाहे अपने मन की भड़ास निकाल सकता है ।

राजनीति के केंद्र बिंदु  में रहने वाले नेहरू और सदैव  इतिहास के तथ्यों में उलझे रहने वाले गांधी । देश में प्रत्येक दिन कही न कही इनकी आत्मा को जिंदा किया जाता है ।

भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन में दोनों व्यक्तियों की विशेष भूमिका रही है। राष्ट्रवादी आंदोलन  से कही ज्यादा आज इनकी भूमिका राजनीतिक दलों को है। नेहरू वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं विकासवादी सोच रखने वाले व्यक्ति और गांधी समाज में व्याप्त कुरीतियों ,शांति  एवं गाँव में देश देखने वाले व्यक्ति जिनकी आत्मा गाँवो ने निवास करती है। हाल के दिनों में गांधी की तुलना कोई राखी सावंत से कर रहे हैं, तो कोई असत्य तथ्यों का सहारा लेकर  राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं।  देश को राष्ट्रपिता कहे जाने वाले गांधी को  जब कोई संवैधानिक पदों पर आसीन  व्यक्ति उनकी  तुलना  राखी सावंत से करे तो वह देश को अपमानित करने वाली बात है ।गांधी प्लूटो ,अरस्तू ,मार्क्स की भांति क्रमव्रद्ध या किसी विशेष सिद्धांतो की विवेचना नही की है । गांधी का चिंतन समय परिस्थितियों के अनुरूप हैं। गांधी कोई सुव्यवस्थित दर्शन नही है । लेकिन ये सत्य है गांधी समय की मांग है । वर्तमान स्थिति को लेकर देखे तो भारत की सामाजिक ,आर्थिक ,राजनीतिक  में विषमता दिखाई देती है  । आज चारों तरफ गरीबी ,बेरोजगारी ,अशिक्षा ,किसानों की खराब स्थिति ,मंहगाई ,महिलाओं की निम्न स्थिति ,सामाजिक न्याय, समानता  के आधार पर जो अपने विचार प्रकट किए हैं गांधी  जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने वाली बात है। अक्सर देखने को मिलता है कि जो मानव के कल्याण की बात करता है उसे लोग स्वीकार नहीं कर पाते हैं। गांधी 1939 में कहते हैं की गांधीवाद जैस कुछ नही है ,हम अपने पीछे कोई वाद नही छोड़ जाना चाहते हैं  ।परन्तु स्वयं स्वीकार करते हैं कि गांधी मर सकते हैं लेकिन गांधीवाद नही मर सकता है। गांधी जितने अधिक पुराने होते हैं उन्हें उतना ही याद किया जाता है।

अजय प्रताप तिवारी।

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