चुप्पी सी छाई रहती है हर दम मेरे लबों पर ,
क्या मैं मुख्य नहीं हो सकती ?
हो सकती हूं !
हां मैं भी तुम्हारी तरह मुख्य हो सकती हूं ,
मैं भी तर्क-वितर्क कर सकती हूं ,
रखती हूं मैं भी ज्ञान बहुत, तुम से कुछ कम नहीं हूं ।
जानती हूं भला-बुरा यूं अक्ल-कम नहीं हूं ,
मगर तुम सी मैं अक्खड़ भी तो नहीं हूं ,
तुम ही मैं लाज बेचने वाली भी तो नहीं हूं , जिस दिन हो गई मुखर मैं तो बवंडर आ जाएगा धरती पर ।
खुदा भी झुक कर सलाम करेगा मूंदे आ कर धरती पर,
तोड़ दूंगी बेड़ियां मैं जिस दिन बंदिशों की, नहीं मैं लाज का पर्दा नहीं हटाऊंगी, मर्यादा भंग नहीं करूंगी,
रह करके मर्यादा में मुंह-तोड जवाब दूंगी , उस दिन मेरी कद्र करेगा ये पुरूष-प्रधान समाज।
जिस दिन इन लबों को मैं खोलूंगी , मैं भी पुरुषों सी मुखर होकर बोलूंगी, छीन लूंगी मैं हक अपना हक से, उस दिन मैं पुरूषो को संग अपने तोलूंगी , तब ना मेरा पलड़ा हल्का होगा, ना पुरूषो का होगा भारी , मैं भी बराबर का गीत बोलूंगी।
प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर )