त्याग, सेवा और समर्पण के प्रतिमूर्त थे भारत के पहले राष्ट्रपति डाॅ० राजेन्द्र प्रसाद। आज उनके जन्म दिन के127वां वर्षगांठ है।यूं तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका पदार्पण वक़ील के रूप में हुआ था। राजेन्द्र बाबू महात्मा गाँधी की निष्ठा, समर्पण एवं साहस से बहुत प्रभावित होकर 1921 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर से पदत्याग कर दिया था। भारत के आजादी के लिए जिन लोगों ने राजनीतिक आंदोलन चलाये ,उन आंदोलन कर्ताओं में डाॅ०राजेन्द्र प्रसाद भी जवाहर लाल नेहरू,सुभाष चन्द्र बोस,जय प्रकाश नारायण आदि के नाम में उल्लेखनीय है,जिन्होंने भारत की आजादी के बाद भी भारत के राजनीतिक क्षेत्रों को प्रभावित करके भारत के कई क्षेत्रों में एक नई दिशा दी।
चम्पारण के गाँवों में गाँधीजी नील की खेती में तीन कठिया का विरोध करने के लिए आये,तो उनके साथ जी० बी० कृपलानी,महादेव देसाई,नरहरि पारेख,ब्रज किशोर के साथ राजेंन्द्र प्रसाद भी शामिल थे, उन्होंने गांधी के साथ चम्पारण के गाँवों का भ्रमण करके किसानों का दुख दर्द समझा और जाना, कि कैसे किसानों का शोषण चम्पारण में बागान मालिक कर रहें हैं।1914 में बिहार और बंगाल मे आई बाढ़ में उन्होंने काफी बढ़चढ़ कर सेवा-कार्य किया।सन् 1934 के बिहार भूकंप में राजेन्द्र बाबू कारावास में थे। जेल से दो वर्ष में छूटने के पश्चात वे भूकम्प पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन-मन से जुटे, वायसराय के जुटाये धन से कहीं अधिक अपने व्यक्तिगत प्रयासों से धन जमा किया। सिंध और क्वेटा के भूकम्प के समय भी उन्होंने कई राहत-शिविरों का इंतजाम अपने हाथों में लिया था, जो देश सेवा का उनका एक मिशाल है, जिसको देश कभी भी भूल नहीं सकता।
1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने एक बार पुन: 1939 में सँभाला था।भारत के स्वतन्त्र होने के बाद संविधान लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार सँभाला। राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांग्रेस को दखल अंदाजी का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करते रहे। हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई ऐसे दृष्टान्त पेश किया जो बाद में उनके परवर्तियों के लिए मिसाल कायम हो गया।
संविधान के प्रति उनकी निष्ठा और गरिमा को कभी भूलाया नहीं जा सकता, उदाहरण तौर पर भारतीय संविधान के लागू होने से एक दिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया था, परन्तु वो भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कार में भाग लेने गये। 12 वर्ष तक राष्ट्रपति के रूप में इन्होंने कार्य करने के पश्चात 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की। अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया।राजेन्द्र बाबू की वेशभूषा बड़ी सरल थी। उनके चेहरे- मोहरे को देखकर पता ही नहीं लगता था, कि वे इतने प्रतिभा सम्पन्न और उच्च व्यक्तित्व के गौरवशाली व्यक्ति हैं। देखने में वे एक सामान्य किसान की भांति दिखाई पड़ते थे।
उनके सरलता और सहजता पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने उन्हें डाक्टर ऑफ लाॅ की सम्मानित उपाधि प्रदान करते समय यह कहा था - "बाबू राजेंद्र प्रसाद ने अपने जीवन में सरल व नि:स्वार्थ सेवा का ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत किया है।" वकील बनने और व्यवसाय में चरम उत्कर्ष पर पहुंचने के करीब की उपलब्धि को त्यागकर राष्ट्रीय कार्य के आह्वान पर गाँवों में गरीब तथा दीन कृषकों के बीच काम करना स्वीकार कर लिया।"सरोजिनी नायडू ने उनके बारे में लिखी थी - "उनकी असाधारण प्रतिभा, उनके स्वभाव का अनोखा माधुर्य, उनके चरित्र की विशालता और अति त्याग के गुण ने शायद उन्हें हमारे सभी नेताओं से अधिक व्यापक और व्यक्तिगत रूप से प्रिय बना दिया है। गान्धी जी के निकटतम शिष्यों में उनका वही स्थान है जो ईसा मसीह के निकट सेंट जॉन का था।"
सरोजिनी नायडू की उक्ति भायीयों के लिए अविस्मरणीय हैं। राजेन्द्र बाबू राजनेता के साथ-साथ एक अच्छे लेखक भी थे, जिन्होंने अपनी आत्मकथा (1946ई०) के अतिरिक्त कई पुस्तकें भी लिखी, जिनमें बापू के कदमों में बाबू(1954ई०), इण्डियाडिवाइडेड (1946ई०), सत्याग्रह ऐट चम्पारण(1922ई०), गान्धीजी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र,मेरी यूरोप यात्रा
जैसी पुस्तकें शामिल हैं।
लेखक-:
प्रो. अरविन्द नाथ तिवारी
विभागाध्यक्ष (इतिहास विभाग)
पीयूएसटी महिला महाविद्यालय
बगहा(प०चम्पारण)