वेद वाणी

भाव के हीं भूखा,भगवान संसार मे हैं

भाव से पुकारे जो, उसी के घर जात हैं

जैसे दुर्योधन घर,मेवा ठुकराय दिए

विदुर  के घर साग, खात ना लजात हैं


भक्त के सोझा, हार जाते भगवान जी हैं

इसीलिए भक्त वत्सल, कहलात हैं

सीने से उठाई के,लगाय लिए गिद्धवा को

केंवट को नेह देत, देत ना अघात हैं


द्रोपदी की टेर सुन,गरुण छोड़ी धाय प्रभु

ग्राह बध करने मे,नही सकुचात हैं

कहीं पर कोमल तो, कहीं पे विराट रूप

भावना हो जिसकी जैसी, वैसे हीं लखात हैं


करुणा के खान "नवल ",दया के निधान हैं वो

द्वारका जस नगर,सुदामा का किए जात हैं

नैन के नीर से वो,चरण पखार दिए

हाथ से तो छुए नही,पानी वो परात हैं


सारा संसार करतार के हाथों मे पड़ा

क्या है अपना ये नही,किसी को बुझात है

मेवा मिष्ठान्न व्यर्थ,पूड़ी पकवान सब

आप होइए हरि का, बस यहीं तो सौगात है

                                 


                       -: नवल प्रसाद

                              बेतिया, प-चम्पारण




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