विजयोत्सव दिवस के अवसर पर याद किए गए बाबू वीर कुंवर सिंह

रजौन, बांका : शनिवार को प्रखंड क्षेत्र के कई सरकारी, गैर सरकारी शिक्षण संस्थानों के अलावे कई अन्य स्थानों पर देश के पहले स्वाधीनता संग्राम 1857 में अंग्रेजों को धूल चटाने वाले महान देशभक्त बाबू वीर कुंवर सिंह को उनके विजयोत्सव दिवस के अवसर पर याद किया गया। मालूम हो वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवंबर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम बाबू साहबजादा सिंह एवं माता का नाम पंचरत्न कुंवर था। इनके पिता प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे। उनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह और इसी खानदान के बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह तथा गजराज सिंह नामी जागीरदार रहे। बिहार का यह राजपूताना परिवार लंबे समय से अपनी स्वतंत्रता बचाकर रखे थे। दादा-पिता भाई के बाद वीर कुंवर सिंह के हाथों जगदीशपुर रियासत की बागडोर आ चुकी थी। 1857 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढ़ाया। मंगल पांडे की बहादुरी ने सारे देश में हलचल मचा दिया। 1857 में जब मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी स्वाधीनता संग्राम की चिंगारी भड़क उठी थी। इस दौरान बाबू वीर कुंवर सिंह ने अपने सेनापति मैकू सिंह के साथ भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया। वह युद्ध करते हुए आगे बढ़ रहे थे और रास्ते में अंग्रेज सैनिकों के सिर बिछाते चल रहे थे। जानकारी के अनुसार 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों और अन्य साथियों के साथ उन्होंने आरा पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद अंग्रेजों की कई कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा। अंग्रेजी फौज आरा पर हमले के लिए आगे बढ़ी तो बीबीगंज और बिहियां के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई। कुंवर सिंह छापामार युद्ध में भी प्रवीण थे, इस स्थिति में अंग्रेजों को यहां भी मुंह की खानी पड़ी और कुंवर सिंह जगदीशपुर की ओर बढ़ गए, हालांकि अंग्रेजों ने आरा पर कब्जा कर ही लिया और जगदीशपुर पर भी आक्रमण कर दिया. ऐसे में बाबू वीर कुंवर सिंह को वहां से निकलना पड़ा। अंग्रेज सैनिकों ने लगातार उनका पीछा किया। वे रीवा, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर में अंग्रेजों को धूल चटाते रहे। भोजपुर और उत्तर प्रदेश की सीमा पर पहुंचकर वे एक दिन गंगा पार कर रहे थे, इसी दौरान अंग्रेजों की गोली उनकी बांह में लग गई। कुंवर सिंह ने तुरंत अपना हाथ काटकर गंगा में समर्पित कर दिया। 80 साल का यह बूढ़ा काल भैरव इच्छामृत्यु पाए भीष्म पितामह की तरह अंग्रेजों से लड़ता रहा। इसके बाद कुंवर सिंह ने एक बार फिर हिम्मत जुटाई और जगदीशपुर स्थित अपने किले को अंग्रेजों से मुक्त कराकर ही दम लिया। ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है, 'उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी। यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की उम्र अस्सी के करीब थी। अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता।' इन्होंने 23 अप्रैल 1858 में, जगदीशपुर के पास अंग्रेजों से अंतिम लड़ाई लड़ी। ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों को इन्होंने पूरी तरह खदेड़ दिया। उस दिन बुरी तरह से घायल होने के बावजूद भी इस बहादुर ने जगदीशपुर किले से अंग्रेजों का "यूनियन जैक" नाम का झंडा उतार कर ही दम लिया। इसी की याद में 23 अप्रैल को बाबू वीर कुंवर सिंह का विजयोत्सव दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 26 अप्रैल 1858 को कुंवर सिंह का निधन हो गया, लेकिन उनकी तलवार का डर ऐसा था कि अंग्रेज जगदीशपुर पर कब्जे का विचार कई महीनों तक नहीं ला सके थे। इसी विजय दिवस के अवसर पर शनिवार को इंटर स्तरीय राष्ट्रीय उच्च विद्यालय धौनी परिसर में कार्यक्रम आयोजित कर उनके तैलचित्र पर पुष्पांजलि करके उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक कुमार दिनकर, शिक्षक उदय कांत मंडल, गौतम गोविंद, अशफाक अहमद, फिरोज आलम, अनामिका, प्रवीण, सुनीता कुमारी, राकेश रंजन, कृष्णदेव सिंह, राजीव कुमार, सोनू कुमार, रामचंद्र कापरी, शिखा रानी, प्रीति कुमारी, कौशल कुमार, रश्मि कुमारी, सुनील टुड्डू तथा धोरैया एवं अद्वैत मिशन बौंसी बीएड कॉलेज के प्रशिक्षु छात्र-छात्राएं के साथ-साथ विद्यालय के सभी छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

रिपोर्ट:केआर राव 

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