दिव्यांशु राठौर की रिपोर्ट
शंभुगंज (बांका) : प्रखंड मुख्यालय के समीप बना गांधी ग्रंथालय बदहाली के दहलीज पर खड़ी है ।आजादी के एक वर्ष बाद सन 1948 ई० में गांधी ग्रंथालय का निर्माण हुआ था।इसके लिए करसोप के सियालाल मेहता ने पांच कट्ठा जमीन गांधी ग्रंथालय के नाम किया।जहां ग्रामीणों के सहयोग से दो कमरे का मिट्टी का घर और पुआल से छावनी किया गया और आपस में चंदा इकट्ठा कर चरखे की खरीददारी की गई ।वहीं स्वतंत्रता सेनानी ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह , स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही धीरेन्द्र प्रसाद यादव सहित अन्य ने बताया कि उस वक्त यहां मिनी हस्तकरघा उद्योग चलता था , ताकि किसी तरह गरीबों का रोजी रोटी चलता रहे। क्षेत्र के लोग बैठकर गांधीजी के विचारों का मंथन करते थे और उनके विचारों पर चलने के लिए लोगों को प्रेरित भी करते थे ।कहा कि 15 अगस्त एवं 26 जनवरी को सर्वप्रथम गांधी ग्रंथालय के समीप झंडोत्तोलन का काम होता था। बाद में ग्रंथालय को खादी ग्रामोद्योग में परिणत किया गया।जिसको संचालित करने के लिए एक प्रबंधक की बहाली किया गया। यह सिलसिला दो दशक पूर्व तक चलते रहा। उसके बाद धीरे - धीरे ग्रंथालय प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार हो गया और आमलोगों का भी रूझान कम हो गया।मौजूदा हालात यह है कि ग्रंथालय जीर्ण - शीर्ण हो गया है। मिट्टी का दीवार ढहने लगा है जो किसी खतरे से कम नहीं है।कभी भी दीवार ध्वस्त हो सकती है ।वहीं प्रबंधक धीरेन्द्र प्रसाद से पूछने पर बताया कि मकान पुर्ण रूप से जर्जर हो चुका है। जान को जोखिम में डालकर किसी तरह दिन गुजार रहे हैं। ग्रामोद्योग के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति किया जा रहा है। वहीं बीडीओ प्रभात रंजन से पूछने पर बताया कि यह हमारे कार्य क्षेत्र से बाहर की बात है। वैसे इसकी कायाकल्प के लिए प्रयास जारी है ।