बांस की जगह पीतल औऱ कांसा ने लिया बांस के मजदूर को नही मिल रहा समुचित मजदूरी

बांका: छठ पूजा  में बांस की सुपली में पूजन सामग्री रखकर अ‌र्घ्य देने का विधान है। बांस को आध्यात्मिक दृष्टि से शुद्ध माना जाता है. बदलते दौर में बांस से तैयार दउरा व सुप गुजरे जमाने की चीज बन कर रह गयी है। बढ़ती मंहगाई के कारण बांस से निर्मित दउरा व सुप का स्थान पीतल और लोहे की सुपली ने ले लिया। इसकी सबसे बड़ी वजह इनका टिकाऊ होना है। क्योंकि बांस से बनी इन सामग्रियों को हर साल खरीदना पड़ता है, वहीं पीतल से बनी सुप एक बार खरीद लेने के बाद बार-बार प्रयोग की जा सकती है। प्रखंड में बांस का दउरा और सुप बनाने वाले कारीगरों का बाजार मंदा है। कारीगरों का कहना है कि छठी मईया को अर्घ्य बांस के दउरा और सुप से दिया जाता है। यहीं संस्कृति और परम्परा रही है, लेकिन आज व्रती लोग पीतल की सुपली और लोहे का दउरा खरीद रहे हैं। जिससे बांस का दउरा और सुप कम बिक रहा है। उनका कहना है कि जो दउरा पांच सौ में बिकना चाहिए वो दो सौ में बिक रहा है। छठ में मंहगाई का असर साफ साफ दिख रहा है. व्रती मंहगाई के कारण बांस से बनी सुप और दउरा नहीं खरीद रहे हैं। बाजार में एक दउरे की कीमत 300 से 400 रुपये हैं। ऐसे में छठ व्रती बांस के बने दउरा और सुप नहीं खरीद रहे हैं। पीतल और लोहे के बने दउरा और सुप खरीद रहे हैं। जिस कारण से बांस की सुप और दउरे की बिक्री नहीं हो रही है। कारीगर जो पूंजी लगाए हैं उनका पैसा तक नहीं निकल पा रहा है। ऐसे में उनकी हालत खराब हो गई है।


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