लेखक -:आचार्य राधाकान्त शास्त्री
*देव ऋषि पितृ विस्तार पूर्वक तर्पण विधि:-👇*
पूर्वाभिमुख आसन लगा कर बैठ जाएं और चंदन लगा कर दीप जला लें। फिर थाली में चावल, जौ, तिल, फूल रखें,
अब जलपात्र में गंगाजल और फूल डाल गंगा का आवाहन करें।
तिलक धारण और पवित्री कर दाहिने हाथ के अनामिका में दो कुशाओं की और बाईं हांथ के अनामिका में तीन कुशाओं की पवित्र धारण कर त्रिकुशा, जव, अक्षत फूल और जल लेकर संकल्प पढ़ें
*ॐ अद्य अमुक गोत्रोत्पन्नोहं अमुक शर्मा/वर्मा/गुप्तो/ वैश्यो/दासोहं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्यर्थं देवर्षि मनुष्य पितृ तर्पणं अहं करिष्ये।*
इसके बाद तांबे के पात्र में जल और चावल डालकर त्रिकुशा को पूर्वाग्र रख पात्र को दाएं हाथ में रख बाएं हाथ से ढक कर देव, ऋषियों का आवाहन करें।
*ब्रह्मादयसुरासर्वेऋयःपितरस्तथा*
*आगच्छन्तुमहाभागा ब्रह्माण्डोदरवर्तिनः।*
*एकैकस्य तिलैर्मिश्रां स्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्।* *यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति।*
यज्ञोपवीत और गमछा सव्य (बायें कन्धे पर) सामान्य स्थिति में रखें। दाहिना घुटना जमीन पर लगा के बैठें, अर्घ्य पात्र में चावल डालें, तर्पण के समय अंजलि में जल भरकर सभी अँगुलियों के अग्र भाग के सहारे अपिर्त करें।
इसे देवतीर्थ मुद्रा कहते हैं। प्रत्येक देव शक्ति के लिए एक-एक अंजलि जल डालें।
कुशा का अग्र भाग को
हथेली और अँगुलियों पर
रखें पूवार्भिमुख होकर गंगा
जल मिश्रित जल देते चलें।
ॐ ब्रह्मादयो देवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्। ॐ विष्णुस्तृप्यताम्। ॐ रुद्रस्तृप्यताम्। ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यन्ताम्।
ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्। ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सररू सावयवस्तृप्यताम्। ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्।
ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्। ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्।
ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्। ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्।
ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्।
ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम्।
फिर इसी प्रकार ऋषियों को भी देवताओं की तरह देवतीर्थ से एक-एक अंजलि जल दिया जाता है।
ॐ मरीच्यादि दशऋषयः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्।
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्।
ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्॥
अब उत्तर मुख कर के दिव्य मनुष्य तर्पण उत्तराभिमुख किया जाता है। इसके लिए जल में जौ डालें। जनेऊ और गमछे को माला की भाँति गले में धारण कर अर्थात् पूर्वोक्त कुशों को दायें हाथ की कनिष्ठिका के मूल-भाग में उत्तराग्र रखकर स्वयं उत्तराभिमुख हो निम्नाङ्कित मन्त्रों को दो-दो बार पढते हुए दिव्य मनुष्यों के लिये प्रत्येक को दो-दो अञ्जलि यव सहित जल प्राजापत्य तीर्थ (कनिष्ठिका के मूला-भाग) से अर्पण करें :-
ॐ सनकादयः दिव्यमानवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्॥ पुनरावृत्ति॥
ॐ सनकस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति॥ ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति॥
ॐ सनातनस्तृप्यताम्॥2 पुनरावृत्ति॥ ॐ कपिलस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति॥
ॐ आसुरिस्तृप्यताम्॥2 पुनरावृत्ति॥ ॐ वोढुस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति ॥
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति॥
दिव्य पितृ तर्पण:
दक्षिणाभिमुख होकर बायें
घुटने को पृथ्वी पर रखकर
अपसव्य भाव से जनेऊ और गमछे को
दायें कंधे पर रखकर
जल में काला तिल
मिलाकर पितृ तीर्थ से (अंगुठा
और तर्जनी के मध्य भाग से)
दिव्य पितरों के लिये
तीन-तीन अञ्जलि
जल दें :-
ॐ कव्यवाडादयो दिव्यपितरः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्।
ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
इसी प्रकार चौदह यमों के
लिये भी पितृतीर्थ से ही
तीन-तीन अञ्जलि तिल
सहित जल दें :-
ॐ यमादिचतुदर्शदेवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्।
ॐ यमाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ धर्मराजाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ मृत्यवे नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ अन्तकाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ वैवस्वताय नमः॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ कालाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ सर्वभूतक्षयाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ औदुम्बराय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ दध्नाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ नीलाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ परमेष्ठिने नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ वृकोदराय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ चित्राय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ चित्रगुप्ताय नम: ॥ 3 पुनरावृत्ति॥
तत्पश्चात् इसी अवस्था में निम्न मन्त्रों से यम देवता को नमस्कार कर जल दान करें :-
ॐ यमाय धमर्राजाय, मृत्यवे चान्तकाय च। वैवस्वताय कालाय, सवर्भूतक्षयाय च॥
औदुम्बराय दध्नाय, नीलाय परमेष्ठिने। वृकोदराय चित्राय, चित्रगुप्ताय वै नमः॥
*मनुष्य पितृ तर्पण*
इसके पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्र से पितरों का आवाहन करें:
ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम’
ॐ हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए।
इसके बाद दीप या अग्नि से प्रार्थना करें।
‘हे अग्ने ! तुम्हारे यजन की कामना करते हुए हम तुम्हें स्थापित करते हैं । यजन की ही इच्छा रखते हुए तुम्हें प्रज्वलित करते हैं । हविष्य की इच्छा रखते हुए तुम भी तृप्ति की कामनावाले हमारे पितरों को हविष्य भोजन करने के लिये बुलाओ ।’
तदनन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिये पूर्वोक्त विधि से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल इस प्रकार दें:
ॐ अद्य अमुक गोत्र: अस्मत्पिता अमुक शर्मा/ वर्मा/ गुप्त/ दास: वसुरूपस्तृप्यतांम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मत्पितामह: (दादा) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मत्प्रपितामह: (परदादा) अमुक शर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3
*इसके बाद मातृ तर्पण*
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मन्माता अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मत्प्रपितामही परदादी अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नम: – 3
ॐ उदीरतामवर०
अंगिरसो नः पितरो०
इत्यादि
ॐ नमो व: पितरो रसाय नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो व: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो व: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न:पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो वास आधत्त॥
*द्वितीय गोत्र तर्पण*
इसके बाद
नाना, पर नाना, बूढ़े नाना, नानी पर नानी, बूढ़ी नानी। पत्नी, पुत्र, पुत्री, चाचा, चाची, ताऊ, मामा, मामी, भाई,बहन, बहनोई, बुआ, फूफा, मौसी, मौसा, सास, ससुर, गुरु, गुरुपत्नी, शिष्य, मित्र आदि सबके नाम से सबको तीन तीन अंजुली जल से तर्पण दे।
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मत्मातामह: नाना अमुक: शर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मत् प्रमातामह: परनाना अमुक: शर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मत् वृद्ध प्रमातामह: वृद्ध पर नाना अमुक: शर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मत्मातामही (नानी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मत् प्रमातामही (पर नानी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मत् वृद्ध प्रमातामही (वृद्ध पर नानी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3
इसके बाद इसी तरह जो लोग मर गए हैं उन्हे जैसे..
पत्नी के लिए
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मद् (भार्या)
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मद् पुत्र:
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मद् कन्या
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मद् पितृव्य: (पिता के भाई)
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मद् मातुल: (मामा)
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मद् भ्राता (अपना भाई)
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मद् भगिनी (अपनी बहन)
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मद् पितृ भगिनी (बुआ)
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मद् मातृ भगिनी (मौसी)
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मद् श्वसुर: (ससुर)
ॐ अद्य अमुक गोत्रा
अस्मद् श्वसा (सास)
ॐ अद्य अमुक गोत्र:
अस्मद् गुरु
इत्यादि के नाम से तीन तीन बार जल दान दें।
इसके उपरान्त
पूर्वाभिमुख हो जानेऊ और गमछा ठीक कर पवित्र हो कर नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए देव तीर्थ से चावल युक्त जल गिरावे :-
देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा:। पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा:॥
जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव:। प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:॥
अब फिर दक्षिण मुख होकर, अपसव्य होकर जनेऊ और गमछा दाएं कंधे पर रख के पितृ तीर्थ से तिल युक्त जल दान करें।
नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता:। तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण:॥
ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा:। तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:॥
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा॥
ब्रह्मा जी से लेकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों मेरे कुल की बीती हुई करोडों पीढियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्म लोक पर्यम्त सात द्वीपों के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिल मिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी
मेरे दिये हुए जल से तृप्त हो जायँ।
फिर :-
कंधे के गमछे के एक कोने पर तिल रख के चार तह मोड़ कर जल गिरा के बाईं ओर भूमि पर जल निचोड़ कर गिरावें।
वस्त्र-निष्पीडन का मन्त्र यह है :-
ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृतारू। ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥
फिर भीष्म का तर्पण करें -अन्त में भीष्म
तर्पण किया जाता है। दक्षिणाभिमुख हो पितृ तर्पण
के समान ही अनेऊ और गमछा दाएं कंधे पर करके हाथ में कुश धारण कर
पितृ तीर्थ से तिल मिश्रित
जल के द्वारा तर्पण करें।
भीष्म शान्तनवो वीरः
सत्यवादी जितेन्द्रियः
आभिरद्भिरवाप्नोतु
पुत्रपौत्रोचितां क्रियाम्
ॐ वैयाघ्रपदगोत्राय।
गंगापुत्रः भीष्माय नमः,
फिर पवित्र और सव्य जनेऊ और गमछा बाएं कंधे पर ले खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्ध्य दें :-
एहि सूर्य सहस्त्राशों तेजो राशिं जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाघ्र्य दिवाकरः। ॐ सूर्याय नमः।।
फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओं को नमस्कार करें।
ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः। ॐ आग्नयै अग्नयै नमः। ॐ दक्षिणायै यमाय नमः। ॐ नैऋत्यै नैऋतये नमः।
ॐ पश्चिमायै वरूणाय नमः। ॐ वाव्ययै वायवे नमः।
ॐ उदीच्यै कुवेराय नमः। ॐ ईशान्यै ईशानाय नमः।
ॐ ऊध्र्वायै ब्रह्मणै नमः। ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः।
सव्य होकर पुनः देवतीर्थ से तर्पण करें :-
ॐ ब्रह्मणै नमः। ॐ अग्नयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः।
ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो नमः। ॐ अपां पतये नमः।
ॐ वरूणाय नमः।
हांथ में फूल अक्षत लेकर क्षमायाचना करते हुवे अन्त में तर्पण कर्म
भगवान को समर्पण करें
ॐ अनेन यथा शक्ति कृतेन देवर्षि मनुष्य पितृ तर्पणाख्येन कर्मणा भगवान पितृ स्वरुपी जनार्दन वासुदेव: प्रीयतां न मम। ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु।
फिर हांथ जोड़ कर भगवान का स्मरण करें।
ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णो: सम्पूर्ण स्यादिति श्रुति:॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
ॐ विष्णवे नमः
ॐ विष्णवे नमः
ॐ विष्णवे नमः।
इस प्रकार संपूर्ण तर्पण कर्म संपन्न होता है।
मातृ तर्पण श्राद्ध प्रातः
पितृश्राद्ध मध्यान
से दो घड़ी पहले करें। सबको पितरों का संपूर्ण आशीर्वाद मिले और मिलते रहे।
*नोट: मैंने संक्षिप्त रूप से पूर्ण तर्पण विधि लिखने का प्रयास किया। किंतु इतनी लंबी लेख में यदि कोई त्रुटि रह गई हो तो उसे शीघ्रता समझ कर स्वयं सुधार कर लें।🙏🙏🙏🙏*
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*✒✍🏻 ✒✍🏻*
*हरि ॐ गुरु देव*
*!!ज्योतिषाचार्य!! आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
*🌹शुभम बिहार यज्ञ ज्योतिष कार्यालय🌹*
*राजिस्टार कालोनी*
*पश्चिम करगहिया रोड, वार्ड:- 2, नजदीक कालीबाग OP थाना से पश्चिम*
*बेतिया पश्चिम चम्पारण, बिहार, 845449,*
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*पदेन:-*
*हिंदी - संस्कृत सहायक शिक्षक:- राजकीयकृत युगल प्रसाद +2 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भैसही, चनपटिया, बेतिया बिहार*
*विशेष संपर्क:-*👇
*9934428775*
*9431093636*
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*व्हाट्सअप एवं चल दूरभाष से:-*
*🌺(अहर्निशं सेवा महे)🌺*
*व्हाट्सएप से हर समय आपके सेवा में:-*
*जबकि:- वार्तालाप का संपर्क समय:- प्रातः 5 बजे से 8 बजे तक एवं सायं 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक।*
*!!भवेत् सर्वेषां सर्वदा शुभ मंगलम्!!*
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