बेतिया में AISA का छात्र संवाद: शिक्षा, रोजगार और दमन के खिलाफ एकजुट होने की अपील


बेतिया। बेतिया में आयोजित छात्र संवाद कार्यक्रम में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) से जुड़े छात्र नेताओं ने शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, छात्र अधिकार और कथित प्रशासनिक दमन के मुद्दों को लेकर छात्रों एवं युवाओं से संगठित होने की अपील की। कार्यक्रम में AISA के पूर्व JNU छात्रसंघ अध्यक्ष और छात्र नेता दानिश ने केंद्र सरकार की शिक्षा नीति, परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, बेरोजगारी तथा छात्र आंदोलनों के प्रति सरकार और प्रशासन के रवैये पर सवाल उठाए। वक्ताओं ने छात्रों से AISA के बैनर तले संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में AISA के पूर्व JNU छात्रसंघ अध्यक्ष ने कहा कि छात्रों पर किसी भी तरह का हमला होता है या पुलिस अथवा विश्वविद्यालय-कॉलेज प्रशासन की ओर से दमन किया जाता है, तो छात्रों को एकजुट होकर उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि दमन की किसी भी नीति को स्वीकार नहीं किया जाएगा और छात्रों को उसके खिलाफ खड़ा होना होगा। उन्होंने कहा कि आज के दौर में संगठित हुए बिना इन परिस्थितियों का मुकाबला करना मुश्किल है। उनके मुताबिक छात्रों और युवाओं को एकत्रित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की ताकत पैदा करनी होगी।
वक्ता ने कहा कि छात्रों और युवाओं को केवल दर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि किसी भी प्रकार के दमन के खिलाफ अपनी लोकतांत्रिक आवाज बुलंद करनी चाहिए। उन्होंने छात्रों से AISA की सदस्यता लेने और संगठन के साथ जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि सामूहिक रूप से संघर्ष करने पर ही छात्रों और युवाओं की आवाज को मजबूती मिलेगी।
बेतिया की पहचान के सवाल पर उन्होंने कहा कि यहां राजा-महाराजाओं की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन अब यह तय करने की जरूरत है कि बेतिया की पहचान छात्रों और नौजवानों के अधिकारों तथा दमन के खिलाफ संघर्ष से हो। उन्होंने छात्रों से लाल झंडे के साथ संघर्ष को आगे बढ़ाने और संगठन के माध्यम से अपनी आवाज मजबूत करने की अपील की।
इसके बाद AISA छात्र नेता दानिश ने छात्र और युवा राजनीति के सवाल से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि पिछले करीब 12 वर्षों में देश की राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों में कई बदलाव हुए हैं और उनके मुताबिक छात्र तथा युवा होने की परिभाषा को भी बदलने की कोशिश की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था छात्रों को केवल कॉलेज जाने, महंगी शिक्षा हासिल करने, डिग्री लेने और नौकरी करने तक सीमित रखना चाहती है तथा सामाजिक एवं राजनीतिक सवालों पर चुप रहने की अपेक्षा की जाती है।
दानिश ने भगत सिंह के 1928 में लिखे लेख “Students and Politics” का उल्लेख करते हुए छात्रों से उसे पढ़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि भगत सिंह के विचारों में शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या क्लर्क बनने तक सीमित नहीं था, बल्कि शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक सवालों को समझने और उनके समाधान के बारे में सोचने वाला नागरिक बनाती है। उन्होंने कहा कि छात्र राजनीति से दूरी बनाए रखने की सलाह देने के बजाय युवाओं को शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने “पढ़ो समाज बदलने के लिए और लड़ो पढ़ाई करने के लिए” की विचारधारा को आगे बढ़ाने की बात कही।
उन्होंने देशभक्ति की परिभाषा को लेकर भी भाजपा सरकार पर निशाना साधा। दानिश ने कहा कि आजादी के आंदोलन के दौर में देशभक्त वे लोग माने जाते थे जो तत्कालीन सत्ता और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, जबकि वर्तमान समय में उनके अनुसार सरकार से सवाल करने वालों को ही अलग-अलग तरह के आरोपों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि देशभक्ति का अर्थ सरकार के हर निर्णय का समर्थन करना नहीं, बल्कि देश की समस्याओं को समझना और उन पर सवाल करना है।
उन्होंने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि छात्रों और युवाओं को इन सवालों पर चर्चा करनी चाहिए। उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और तमाम समुदायों के लोगों को समान अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने जाति और धर्म के आधार पर समाज में विभाजन की राजनीति का विरोध करने तथा सामाजिक एकता और समानता के पक्ष में खड़े होने की अपील की।
कार्यक्रम में हाल के छात्र आंदोलनों का उल्लेख करते हुए दानिश ने कहा कि लोकतंत्र में सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे छात्रों और युवाओं की समस्याओं को सुनें। उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन का जिक्र करते हुए दावा किया कि लंबे समय तक चले आंदोलन के बावजूद सरकार ने छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं सुना। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग नामों से बदनाम करने का प्रयास किया गया और सरकार के आलोचकों को “एंटीनेशनल” तथा अन्य विशेषणों से संबोधित किया गया।
उन्होंने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाया। दानिश ने आरोप लगाया कि कई मीडिया संस्थान सरकार की नीतियों का बचाव करने पर अधिक जोर देते हैं और छात्र आंदोलनों तथा उनकी मांगों को पर्याप्त जगह नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका सरकार से सवाल पूछने और जनता की आवाज सामने रखने की भी होनी चाहिए।
पुलिस कार्रवाई का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि विभिन्न छात्र आंदोलनों के दौरान प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, वाटर कैनन और पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने दावा किया कि कुछ प्रदर्शनकारी इन कार्रवाइयों में घायल हुए। बिहार में पुलिस कार्रवाई का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरकार और प्रशासन से जवाबदेही की मांग की। हालांकि, कार्यक्रम में किए गए इन आरोपों और घटनाओं के सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि वक्तव्य के आधार पर नहीं की गई है।
दानिश ने कहा कि छात्रों और युवाओं का सड़कों पर आना और लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करना जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि छात्र आंदोलनों के दबाव में सरकारों को कई मामलों में छात्रों की मांगों पर विचार करना पड़ा। उन्होंने पेपर लीक के मुद्दे को केवल एक-दो परीक्षाओं की समस्या नहीं बताते हुए इसे पूरी परीक्षा व्यवस्था की खामी से जोड़कर देखा।
उन्होंने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। दानिश ने आरोप लगाया कि परीक्षा आयोजित कराने की व्यवस्था में निजी एजेंसियों पर अत्यधिक निर्भरता और पर्याप्त स्थायी कर्मचारियों की कमी जैसी समस्याएं हैं। उनके अनुसार परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना छात्रों के भविष्य के साथ न्याय नहीं किया जा सकता।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लेकर भी उन्होंने केंद्र सरकार की आलोचना की। उनका आरोप था कि शिक्षा को सस्ता और सुलभ बनाने के बजाय व्यवस्था में निजीकरण और महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए पर्याप्त फंडिंग की जरूरत बताते हुए शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाने की मांग दोहराई।
दानिश ने कहा कि भारत जैसे बड़े और युवा आबादी वाले देश में शिक्षा पर अधिक निवेश जरूरी है। उन्होंने शिक्षा के लिए GDP का 6 प्रतिशत खर्च करने की लंबे समय से चली आ रही मांग का उल्लेख किया और आरोप लगाया कि वर्तमान में शिक्षा पर सरकारी खर्च इस स्तर तक नहीं पहुंचा है। उनके अनुसार पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध होने पर ही सरकारी शिक्षण संस्थानों में आधारभूत संरचना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और छात्रों के लिए बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित की जा सकती हैं।
पूरे संवाद के दौरान AISA नेताओं ने शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, छात्र अधिकार, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और कथित सरकारी एवं प्रशासनिक दमन को प्रमुख मुद्दों के रूप में उठाया। वक्ताओं ने छात्रों और युवाओं से इन सवालों पर संगठित होकर आवाज उठाने तथा AISA से जुड़ने की अपील की। कार्यक्रम का समापन संगठन की सदस्यता अभियान चलाने और छात्र-युवा मुद्दों पर लगातार संवाद एवं आंदोलन को आगे बढ़ाने के आह्वान के साथ हुआ।

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