--- भगवती की उपासना के माध्यम से नारी पूजा का पर्व है नवरात्र
माधवेंद्र पाण्डेय,
बगहा :
सनातन में नारी पूजनीय मानी गई है। समस्त पूजा में भगवती पूजा को सर्वोत्तम माना जाता है। सेवानिवृत शिक्षक सह पूर्व प्राचार्य पं. भरत उपाध्याय ने रविवार से शुरू कलश स्थापना व शारदीय नवरात्र के अवसर पर देवी मां के आगमन को लेकर मंदिरों के साथ शहर व ग्रामीण क्षेत्रों में सजे पंडालों का भ्रमण कर बताया कि मनुष्य की निर्मात्री, जन्मदात्री नारी ही है! नारी से ही मनुष्य उत्पन्न होता है। पिता की एक बूंद के अलावे एक बालक का समस्त अंग-प्रत्यंग माता के रक्त से ही निर्मित होता है। इस प्रकार नारी शक्ति की महत्ता को दर्शाने वाला पर्व ही नवरात्र कहा जाता है।
भारत में नवरात्र एक ऐसा पर्व है, जो हमारी संस्कृति में महिलाओं के गरिमामय स्थान को दर्शाता है। महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती की पूजन के साथ ही महामाया के दिव्य नौ स्वरूपों की पूजा नवरात्र में की जाती है। नवदुर्गा का पूजन के क्रम में प्रथम शक्ति के रूप में "मां शैलपुत्री" की पूजा की जाती है। किसी भी नारी के जीवन का प्रथम अध्याय पुत्री के रूप में ही लिखा जाता है। नारी की प्रथम पहचान किसी की पुत्री के रूप में होती है। यदि पुत्रियां नहीं होंगी तो विचार कीजिए कि संसार में आगे की सृष्टि कैसे चलेगी। पुत्रियों की आवश्यकता स्थापित करने के लिए ही महामाया आदिशक्ति ने हिमालय के यहां "शैलपुत्री" के रूप में अवतार लिया था। नवरात्र का व्रत व पूजन सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने किया था। जिसके फलस्वरूप आदिशक्ति से प्राप्त वरदान के बल पर उन्होंने रावण जैसे राक्षस का वध किया। प्रेम से किया गया पूजन विधान कभी निष्फल नहीं जाता है। संसार में पुत्रियों की सुरक्षा की दृष्टि से ही हमारे मनीषियों ने यह बताने का प्रयास किया है कि नवरात्रि का व्रत व पूजन बिना कन्या पूजन व कन्या भोज के संपन्न ही नहीं हो सकता।अत:नवरात्रि में आदिशक्ति की पूजा का फल प्राप्त करना है, तो प्रथम दिवस शैलपुत्री का पूजन करते हुए पुत्रियों के संरक्षण का संकल्प भी लें।
रविवार 11 अक्टूबर से चारों ओर दुर्गापूजा की धूम मच गई है। गांव-गांव व शहरों में पांडाल लगा कर दुर्गा जी की प्रतिमा स्थापित कर नौ दिनों तक तरह-तरह से लोक शक्ति का यह पर्व मनाएंगे। इन नौ दिनों में लोगों के अंदर जितना भक्ति भाव जागृत होता है, यदि मनुष्य उसे बना रहे तो इस संसार का स्वरूप ही बदल जाय। आचार्य बताते हैं कि आज के परिवेश को देखते हुए कन्या पूजन का महत्व कुछ समझ में नहीं आता। किसी भी पूजन को प्रारंभ करने के पहले संकल्प लिया जाता है जिसका अर्थ होता है प्रतिज्ञा करना।आज इस बात का संकल्प लेने की आवश्यकता है, कि हम जिस नारी शक्ति का पूजन करने का संकल्प ले रहे हैं वह किसी भी रूप में हो उसकी सुरक्षा व सम्मान के साथ उसका मान बचाना हमारा परम धर्म व कर्तव्य है, क्योंकि जिस शक्ति की पूजा करने का आयोजन इतना भव्य किया जा रहा है उन शक्तियों के संरक्षण का भार भी इन्हीं नवयुवकों के कंधे पर है। यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी है, कि जिस प्रकार महामाया के विभिन्न स्वरूपों में नारी का सम्मान वे अपने घर में करते हैं। उसी प्रकार सभी नारियों का सम्मान करने का संकल्प लेने से ही दुर्गापूजा मनाने का उद्देश्य पूर्ण होगा। प्रथम दिवस "मईया शैलपुत्री" के लिए समर्पित होता है, अत: पहले दिन से ही पुत्रियों के संरक्षण का संकल्प लेना ही श्रेयस्कर होगा।