मेरे भारत का देशहित,
नेता की हथेली का मैल है..
हाथ जोड़ रंग बदलते,
जैसे छिपकलियों का खेल है..
पंथ निरपेक्ष बना संविधान,
फिर भी लड़वाते हमें जाति-धर्म के नाम..
आजाद भारत में आज,
जनता बनी हुई है इनकी गुलाम..
काली करतूतों की खातिर,
न्यायालय को भी गुमराह करवाते हैं
सर्वोच्च कुर्सी पाने को
हिंदू-मुस्लिम को जानी-दुश्मन बना भरमाते हैं..
लालच के अंधकार में,
अपनी अगली पीढ़ी का भविष्य डुबाते हैं..
मातृभूमि के हित को
अपने पापी मन का देह हित बनाते हैं..
अपनी करनी को छिपाते
मरते-मरते भी न पछताते हैं..।
गाँधी जिनके राष्ट्रपिता,
नेहरू जिनके चाचा हैं..
इन महान व्यक्तितत्वों को
क़्यों स्वर्ग में भी लजवाते हैं ।
पल्लवी सिंह
(एम.ए. पत्रकारिता एवं जनसंचार)
महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय , बिहार
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