अफगानिस्तान भारत का पड़ोसी मुल्क है। इसकी सीमाएं सीधे तौर पर तो भारत को नहीं छूतींं लेकिन भारत के सांस्कृतिक इतिहास की कहानी अफगानिस्तान के बिना पूरी भी नहीं होती। पुराने जमाने से ही भारत का इस भूमि से संबंध रहा है। आरंभिक वैदिक जमाने का पूरा ताना-बाना इस भूमि से जुड़ा रहा है। महाभारत की कथा में गांधारी इसी भूमि की पुत्री थी।
अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी अचानक अपने मुल्क छोड़कर भाग गए। वहां की नागरिक, सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। तालिबान का पूरे देश पर कब्जा हो गया।
ऐसी घटना सचमुच मन को विचलित करती है। क्या सब हो रहा है इस दुनिया में और हम एक मूक दर्शक बनकर सिर्फ बैठे हैं?
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसे अफगान की आजादी कहा तो वहीं चीन ने भी मौन समर्थन व्यक्त किया। वहीं अमेरिका ने अपनी फौजें हटा ली ऐसा आशंका जताया जा रहा है कि तालिबानियों से उनकी कोई तो गुपचुप सांठगांठ पहले से थी।
महाभारत का एक दृश्य याद आ रहा है। द्रौपदी के कपड़े उतारे जा रहे थे तो सभी पांडव सिर झुकाए बैठे थे। अर्जुन भी थे और भीम भी। धृतराष्ट्र अंधे थे, लेकिन शायद बहरे नहीं थे। अपनी बहू की रुलाई तो सुन रहे होंगे। वह भी चुप बैठे रहे। भीष्म के नाम से ख्यात ब्रह्मचारी देवव्रत भी दरबार में थे। दुर्योधन इतना ताकतवर अथवा निपुण था कि सबकी जुबान बंद थी। गनीमत थी कि उस दुनिया में कोई कृष्ण था। द्रौपदी भी जानती थी कि दुर्योधन के तालिबान से यदि कोई भीड़ सकता है तो वह केवल कृष्ण ही है, इसलिए उसने कृष्ण को ही पुकारा। आज अफगान मामले में कुछ स्थिति ऐसे ही नजर आ रही है। पूरी दुनिया देख रही है कि - तालिबानियों ने अफगान को अपने चंगुल में ले लिया है और कहीं से कोई आवाज तक नहीं आ रही है। तालिबानियों की राजनीति इतनी पुख्ता, मजबूत है कि यकीन करना मुश्किल है। इस जमाने में कोई कृष्ण भी नहीं है।
जिस तरह अफगानी जनता को तालिबानियों के हाथ सौंप कर अमेरिका ने कायरता का इतिहास रचा है, वह विश्व की राजनीति का नया चेहरा स्पष्ट कर रहा है। यदि उसे यही करना था तो अफगान राजनीति में वह कूदा ही क्यों था? सोवियत हस्तक्षेप वाले दौर में यदि अमेरिका ने तालिबान का सहयोग नहीं किया होता तो यह इतने मजबूत नहीं हो सकते थे।
तालिबानियों की रूचि सातवीं शताब्दी के इस्लाम और उसकी रूढ़ियों के आधार पर एक समाज, देश बनाना है। तालिबान और लोकतंत्र वादियों के बीच गलियों, चौराहो,मोहल्लों सब जगह लड़ाई शुरू हो गई है। या यूं कहे कि अफगानिस्तान आज तीन हिस्सों में बांटा है। दो तिहाई हिस्से पर तालिबान का और एक चौथाई हिस्से पर मौजूदा सरकार का कब्जा है। शेष पर कब्जे के लिए दोनों पक्षों के बीच लड़ाई जारी है। औरतों और बच्चों पर बंदिशें उनके आते ही लग चुकी है। वही चीन की नजर वहां के खनिज पर है। लाल झंडे के साथ चीन का मार्क्सवादी तालिबान अपने मकसद में जरूर कामयाब होगा। चीन,पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान से भी इसकी शत्रुता स्वाभाविक प्रतीत होती है। यह भयावह स्थिति है। यह ऐसी स्थिति है जिसका असर पड़ोसी मुल्कों पर भी पड़ सकता है।
अफगानिस्तान में राजशाही 1973 में खत्म हुई। जब सोवियत संघ था तब उसने अफगानिस्तान के अंदरूनी मामले में दखल दिया था। इसकी तुलना कुछ तिब्बत में चीन के दखल से किया जा सकता है। रूसी प्रभाव से अफगानिस्तान में समाजवादी खयालों की सरकार बनीं। लेकिन अमेरिका ने हस्तक्षेप किया और सोवियत प्रभाव को खत्म करने के लिए वहां धार्मिक कट्टरपंथियों को अपना समर्थन दिया। इस समर्थन से अफगानिस्तान में सोवियत संघ को काफी नुकसान हुआ। 1991 में सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूसी सेना वहां से हटने लगी। इसी दौर में कट्टरपंथी धार्मिक शक्तियों ने संगठन होना शुरू किया। 1994 में इन शक्तियों ने एक संगठन तालिबान नाम से बनाया। तालिबान पुश्तों जुबान का शब्द है, जिसका अर्थ है "ज्ञानार्थी"। लेकिन मजे की बात यह है कि इन लोगों के लिए ज्ञान केवल और केवल इस्लामी ज्ञान ही है। 2001 में विश्व प्रसिद्ध बामियान युद्ध (बुद्ध की संसार में सबसे ऊंची मूर्ति) को तोप के गोलों से ध्वस्त कर दिया था। 11 सितंबर को अमेरिका के सबसे ऊंचे ट्रेड सेंटर को भी ध्वस्त कर दिया था। फिर अफगानिस्तान में अमेरिका ने दखल दिया और पूरी तरह उलझ गया। 2004 में अफगानिस्तान में नया संविधान बना और उसके सहारे एक आधुनिक देश बनाने की कोशिश की गई।
अफगानिस्तान के मामले में तो एक बात साफ तौर पर समझी जा सकती है कि बाहरी हस्तक्षेप से किसी भी क्षेत्र में न तो समाजवाद आ सकता है ना ही लोकतंत्र। तालिबान ने अफगानिस्तान में लड़कियों के आधुनिक शिक्षा को बिल्कुल मना की है। यह सब एक भयावह भविष्य का ही खाका देते हैं। इसलिए अफगान की घटना और उनके परिणाम को हमें वृहद अर्थों में देखना चाहिए।
